अंतरराष्ट्रीय

Global Water Crisis: विश्व के 60 प्रतिशत नदियों का रुख बदला, बांध बने जल-आपदा के बीज, चिंता बढ़ा रही भयंकर रिपोर्ट

Global Water Crisis:  दुनिया भर में जल संसाधनों और प्रकृति पर लगातार बढ़ रहे दबाव ने कई गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़े कर दिए हैं। अब एक भयंकर रिपोर्ट सामने आई है जिसमें दावा किया गया है कि विश्व की 60 प्रतिशत नदियों का मार्ग बांधों के कारण बदल गया है या वे अवरुद्ध हो गई हैं। यह न केवल जल जैव विविधता को खत्म कर रहा है, बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन गया है।

प्रकृति के संतुलन पर मानव हस्तक्षेप का भारी प्रभाव

‘ग्लोबल लैंड आउटलेट’ की रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी की एक तिहाई भूमि का स्वरूप पूरी तरह से मानव गतिविधियों से बदल चुका है। नदियों, जंगलों और मिट्टी की प्राकृतिक स्थिति प्रभावित होने से जैव विविधता बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न संगठनों की रिपोर्ट में कहा गया है कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव के कारण पानी के भीतर के जीव संकट में हैं। उदाहरण के तौर पर एशिया की मेकांग नदी पहले मछलियों का स्वर्ग मानी जाती थी, लेकिन बांध बनने के बाद मछलियों का प्रवास बाधित हुआ और कई प्रजातियां विलुप्त हो गईं।

जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर असर

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बांधों के कारण नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी आई है, जिससे लाखों लोगों को भोजन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। नदियों के साथ-साथ बढ़ती सड़कों और रेलवे की संख्या भी पर्यावरण पर दबाव बढ़ा रही है। 2050 तक सड़क परिवहन में 60 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे मिट्टी में क्षरण और भूस्खलन जैसी समस्याएं बढ़ेंगी, जो बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं को और गंभीर बना देंगी।

धरती के 40 प्रतिशत भाग में हो रहे गंभीर नुकसान

विश्व की करीब 40 प्रतिशत भूमि मानव गतिविधियों के कारण गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के रेत उन्मूलन रोकथाम संगठन (UNCCD) की कार्यकारी सचिव यास्मिन फौद का कहना है, “धरती पर जीवन भूमि और जल के प्राकृतिक संतुलन की वजह से संभव है। यदि हम इसे प्रभावित करते हैं, तो इसका खामियाजा हमें भुगतना होगा। पारिस्थितिकी तंत्र को जल्द से जल्द पुनर्स्थापित करना जरूरी है।”

बांधों के टूटने का खतरा और संभावित जल-आपदा

रिपोर्ट में बांधों को लेकर भी गंभीर चेतावनी दी गई है। बांध इतने जल संचय करते हैं कि यदि कोई बांध टूट जाए, तो आसपास के विशाल क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं। भारत के कई प्रमुख बांध जैसे तिहरी, भाखड़ा, हीराकुंड, नगरजुना, बागलिहार, नाथपा, कडाना, चांदिल और सरदार सरोवर पहले से ही पुराने और कमजोर हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये बांध किसी भी समय बड़े विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकते हैं।

भू-स्खलन और भूकंप का खतरा बढ़ा

वैज्ञानिकों का मानना है कि बांधों के आसपास के क्षेत्र भूकंप के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इसलिए बांधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिए तत्काल कदम उठाना बेहद जरूरी है, अन्यथा ये मानव और पर्यावरण दोनों के लिए भारी आपदा साबित हो सकते हैं।

यह रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी है कि प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग और मानव गतिविधियां धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रही हैं। यदि हम समय रहते उचित संरक्षण और नीतिगत बदलाव नहीं करते हैं, तो जल संकट, बाढ़ और खाद्य असुरक्षा जैसी समस्याएं और बढ़ेंगी। इसलिए, बांधों और नदियों के प्रबंधन में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की जरूरत है।

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