Jharkhand High Court : रांची में झारखंड हाई कोर्ट की रेप के प्रयास से जुड़े एक पुराने मामले में की गई टिप्पणी चर्चा का विषय बनी हुई है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि रात में किसी महिला के घर में घुसकर उसके कपड़े उठाने की कोशिश करना हर परिस्थिति में रेप के प्रयास के अपराध के दायरे में नहीं आएगा। कोर्ट ने इसे महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल से जुड़ा अपराध माना।
निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में दी गई चुनौती
यह मामला करीब 26 साल पुराना बताया गया है। घाटशिला सत्र अदालत ने 25 जुलाई 2006 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इस फैसले को दोषी ने झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के तथ्यों और आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की कानूनी स्थिति पर विचार किया।

महिला की गरिमा भंग करने का माना गया मामला
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में बदलाव करते हुए कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर यह मामला रेप के प्रयास के बजाय महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के प्रयोग से संबंधित है। अदालत की इस टिप्पणी ने रेप के प्रयास के अपराध के लिए जरूरी कानूनी कसौटी को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखा है।

न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने क्या कहा
न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल ऐसा प्रत्यक्ष कृत्य, जो रेप किए जाने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो, अपने आप में भारतीय दंड संहिता के तहत रेप के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा। अदालत ने अपराध के प्रयास और उससे पहले किए गए कृत्यों के बीच कानूनी अंतर पर भी ध्यान दिया।
क्या है प्रत्यक्ष कृत्य का कानूनी मतलब
अदालत की टिप्पणी में प्रत्यक्ष कृत्य यानी ऐसे कदम की बात सामने आई, जो किसी अपराध को अंजाम देने की योजना को आगे बढ़ाने के लिए उठाया जाता है। हालांकि, किसी कृत्य को रेप के प्रयास के रूप में मानने के लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी का कदम अपराध को पूरा करने के लिए कितना निकट और प्रत्यक्ष था। इसी कानूनी पहलू के आधार पर हाई कोर्ट ने मामले का मूल्यांकन किया।

पीड़िता ने आरोपी पर क्या आरोप लगाए थे
मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी रात के समय उसके घर में घुसा था। आरोप था कि उसने रेप करने के इरादे से महिला के कपड़े उठाने की कोशिश की। इसी आधार पर निचली अदालत ने आरोपी को रेप के प्रयास का दोषी माना था और चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने सजा में भी किया बदलाव
अपील पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में संशोधन किया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता पहले ही करीब आठ महीने हिरासत में रह चुका है। कोर्ट ने माना कि उसके द्वारा बिताई गई हिरासत की अवधि पर्याप्त है। इसके बाद मामले में पहले सुनाई गई चार साल की सजा में बदलाव किया गया।
31 अगस्त को सुनाया गया था फैसला
झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला 31 अगस्त को सुनाया गया था, जबकि इसे सार्वजनिक रूप से सोमवार 7 सितंबर को जारी किया गया। फैसले में रेप के प्रयास के अपराध के लिए जरूरी कानूनी तत्वों पर टिप्पणी की गई है। 26 साल पुराने इस मामले में हाई कोर्ट की व्याख्या के बाद यह फैसला कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा में आ गया है।
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