SIR voter List Controversy : मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर उठे सवालों पर मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। इन याचिकाओं में चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया और कुछ चुनावी फैसलों की वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने संबंधित मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अब इस मामले में चुनाव आयोग के जवाब और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर नजर रहेगी।

राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने उठाए सवाल
इस मामले में राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत राय, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राजद नेता तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, एमए बेबी, डी. राजा, महुआ माझी, सुप्रिया सुले और ईटी मोहम्मद बशीर सहित कई नेताओं के नाम याचिकाकर्ताओं में बताए गए हैं। याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की भूमिका का भी उल्लेख है। याचिकाकर्ताओं ने आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर से जुड़े निर्णयों पर सवाल उठाए हैं।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जवाब
सुनवाई से पहले भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया। आयोग ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने एसआईआर से संबंधित फैसले अकेले नहीं लिए। आयोग के मुताबिक, याचिका में लगाए गए कुछ आरोप एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित हैं और उन्हें पर्याप्त तथ्यात्मक आधार के बिना पेश किया गया है। यह आयोग का अदालत में रखा गया पक्ष है; याचिकाओं पर अंतिम निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए फैसले: आयोग
हलफनामे में आयोग ने कहा कि एसआईआर से संबंधित तीन प्रमुख आदेश जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में आयोग के सामूहिक निर्णय के तहत जारी किए गए थे। आयोग के अनुसार, फैसलों पर तीनों सदस्यों की सहमति थी। उसने यह भी स्पष्ट किया कि फाइलों पर दर्ज टिप्पणियों, सुझावों या सवालों को अपने आप आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। आयोग ने अपनी निर्णय प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि जरूरी मंजूरियां निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ली जाती हैं।
फॉर्म-6 और मतदाता सूची को लेकर क्या कहा गया?
चुनाव आयोग ने हलफनामे में दावा किया कि नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में औपचारिक बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फॉर्म और घोषणा-पत्र के प्रदर्शन से बदलाव का भ्रम पैदा हो सकता है, लेकिन दोनों की भूमिका अलग है। आयोग ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया संबंधित निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के तहत होती है।

अनमैप्ड मतदाताओं की सुनवाई पर आयोग का रुख
हलफनामे के अनुसार, जिन मतदाताओं का पुरानी मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाया है, उन्हें हर स्थिति में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाना जरूरी नहीं है। आयोग ने कहा कि बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर जाकर आवश्यक दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं। इस मुद्दे पर याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां और आयोग का जवाब सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अब अदालत के रुख पर टिकी निगाहें
इस मामले का केंद्र चुनाव आयोग की संस्थागत निर्णय प्रक्रिया, एसआईआर की वैधता और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े नियम हैं। याचिकाकर्ताओं की दलीलें और आयोग का हलफनामा अदालत के सामने हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इन पक्षों पर विचार कर सकता है। हालांकि, किसी भी पक्ष के दावे को अदालत का निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। मामले में आगे क्या निर्देश दिए जाते हैं, यह सुनवाई और अदालत के आदेश से स्पष्ट होगा।
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