Digha Jagannath Temple : पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दीघा में नवनिर्मित जगन्नाथ मंदिर को लेकर चल रहा लंबा विवाद अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मंगलवार को एक बड़ा ऐतिहासिक ऐलान करते हुए स्पष्ट किया कि इस परिसर को अब हिंदू धर्म के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक ‘धाम’ के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी। कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब इस पूरे भव्य परिसर को आधिकारिक तौर पर ‘श्रीश्री जगन्नाथ सांस्कृतिक केंद्र’ के नाम से जाना जाएगा। हालांकि, परिसर के मुख्य ढांचे को, जहां भगवान की मुख्य प्रतिमाएं स्थापित हैं, ‘श्री जगन्नाथ देव मंदिर’ कहा जाएगा।

ओडिशा सरकार की आपत्ति और संबित पात्रा की मध्यस्थता
इस संवेदनशील धार्मिक मामले में पड़ोसी राज्य ओडिशा सरकार ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का एक विशेष पत्र लेकर पुरी के भाजपा सांसद संबित पात्रा एक दूत के रूप में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मिलने पहुंचे थे। ओडिशा सरकार का तर्क था कि सदियों से पुरी स्थित 12वीं शताब्दी का जगन्नाथ मंदिर ही एकमात्र “जगन्नाथ धाम” के रूप में विश्वविख्यात है। दीघा के मंदिर के लिए ‘धाम’ शब्द का उपयोग करने से ओडिशा के साढ़े चार करोड़ लोगों और जगन्नाथ संस्कृति को मानने वाले सनातनियों की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंच रही थी।

सनातन परंपरा में चार धामों का महत्व और आदि शंकराचार्य का नियम
भाजपा सांसद संबित पात्रा ने इस निर्णय पर खुशी जताते हुए सनातन परंपरा के मूल सिद्धांतों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में पवित्र ‘चार धामों’ की स्थापना की थी, जिनमें से पूर्वी दिशा का धाम ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ धाम है, जहां साक्षात भगवान नारायण निवास करते हैं। शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार कोई भी नया मंदिर स्वयं को ‘धाम’ घोषित नहीं कर सकता। दीघा मंदिर को धाम कहे जाने से न केवल ओडिशा बल्कि बंगाल के भी सच्चे सनातन प्रेमी और भक्त काफी दुखी थे।
तृणमूल सरकार पर तुष्टिकरण और सनातनी परंपराओं के अपमान का आरोप
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पिछली ममता बनर्जी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पिछली सरकार के कैबिनेट प्रस्तावों, एचआईडीसीओ (HIDCO) के टेंडर और सरकारी निविदा नोटिसों में इस परियोजना को केवल एक ‘सांस्कृतिक केंद्र’ के रूप में ही चिन्हित किया गया था। उसमें ‘धाम’ शब्द का कोई कानूनी प्रावधान ही नहीं था। पिछली सरकार ने केवल राजनीतिक लाभ और तुष्टिकरण के लिए बाद में इस शब्द को जोड़ा, जो सनातन परंपरा का सीधा अपमान था। वर्तमान सरकार ने मुख्य सचिव को निर्देश देकर इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने और आवश्यक अधिसूचना जारी करने के आदेश दे दिए हैं।
मंदिर में सात्विक पूजा पद्धति और इस्कॉन के मुख्य पुजारी का समर्थन
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि ‘धाम’ शब्द हटने के बावजूद मंदिर की धार्मिक पवित्रता में कोई कमी नहीं आएगी। परिसर के भीतर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की दैनिक पूजा-अर्चना शास्त्रों और धर्मग्रंथों में वर्णित नियमों के अनुसार पूरी तरह सात्विक पद्धति से संपन्न होगी। श्रद्धालुओं में नियमित महाप्रसाद का वितरण किया जाएगा और प्रबंधन ट्रस्ट की सभी जानकारियां मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर पारदर्शी तरीके से उपलब्ध होंगी। दीघा मंदिर के रख-रखाव की जिम्मेदारी संभाल रहे इस्कॉन (ISKCON) के मुख्य पुजारी राधारमण दास और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष दिब्यसिंह देब ने भी मुख्यमंत्री के इस कदम का तहे दिल से स्वागत किया है।











