CG Liquor Revenue : छत्तीसगढ़ की सियासत में पूर्ण शराबबंदी का संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। इस समय राज्य में शराब की बिक्री और उससे होने वाली रिकॉर्ड तोड़ कमाई को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खिंच गई हैं। एक तरफ जहां मौजूदा सरकार आबकारी विभाग से होने वाली इस भारी-भरकम आय को राज्य की विकास योजनाओं और वित्तीय मजबूती से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल और तमाम सामाजिक संगठन इसे समाज के ताने-बाने के लिए एक गंभीर खतरा बता रहे हैं।
राज्य में वर्तमान में संचालित 703 सरकारी शराब दुकानों के जरिए हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व आ रहा है, जिसे सरकार अपनी बड़ी आर्थिक उपलब्धि मान रही है, लेकिन इसी चमक के पीछे शराबबंदी की गूंज भी उतनी ही तेज हो गई है।
राजस्व में ऐतिहासिक और जोरदार बढ़ोतरी
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ सालों के भीतर शराब की बिक्री से मिलने वाले सरकारी राजस्व में अप्रत्याशित और भारी इजाफा देखने को मिला है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्तीय वर्ष 2019-20 में राज्य सरकार को आबकारी से लगभग 4,952 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था, जो चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 में छलांग लगाते हुए सीधे 10,751 करोड़ रुपये के जादुई आंकड़े तक पहुंच गया है। महज छह वर्षों में यह कमाई दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है। इतने पर ही रुकने के बजाय सरकार ने अगले वित्तीय सत्र 2026-27 के लिए आबकारी राजस्व में 10 प्रतिशत और बढ़ोतरी का एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। यह नीति साफ संकेत देती है कि आबकारी विभाग अब राज्य की अर्थव्यवस्था और आमदनी का सबसे बड़ा और रीढ़ की हड्डी जैसा जरिया बन चुका है।
सत्ता पक्ष की दलील
राजस्व में हुई इस भारी बढ़ोतरी का बचाव करते हुए राज्य के आबकारी मंत्री लखन देवांगन ने सरकार का पक्ष मजबूती से रखा है। उनका स्पष्ट कहना है कि आबकारी विभाग से मिलने वाला यह बढ़ा हुआ राजस्व ही आज प्रदेश में विभिन्न महत्वाकांक्षी और जनकल्याणकारी योजनाओं को सुचारू रूप से चलाने में ईंधन का काम कर रहा है। मंत्री के मुताबिक, राज्य की महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही ‘महतारी वंदन योजना’, गरीबों को छत देने वाली ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ और अन्नदाताओं (किसान भाइयों) के कल्याण के लिए संचालित बड़ी योजनाओं को सफलतापूर्वक जमीन पर उतारने में इस आय की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। सरकार का सीधा तर्क है कि जब तक वित्तीय संसाधन नहीं बढ़ेंगे, तब तक राज्य का चौतरफा विकास तेज गति से संभव नहीं है।
विपक्ष का करारा पलटवार
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर सरकार की नीतियों पर चौतरफा हमले कर रही है और उसे घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रही। राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने सरकार के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि शराब की बिक्री से होने वाली पापकमाई को महिलाओं और जनहित की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर देखना नैतिक और सामाजिक रूप से बिल्कुल भी सही नहीं है।
उनका दृढ़ विश्वास है कि शराब से मिलने वाले भारी राजस्व के बदले समाज को जो अपूरणीय क्षति उठानी पड़ती है, उसकी भरपाई किसी भी सरकारी योजना से नहीं की जा सकती। सिंहदेव के अनुसार, शराबखोरी का सबसे बुरा और सीधा असर गरीब परिवारों की महिलाओं और मासूम बच्चों पर पड़ता है। विपक्ष का जोर इस बात पर है कि सरकार को केवल मुनाफे और वित्तीय नजरिए से अपनी आंखें बंद नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का भी निर्वहन करना चाहिए।
मुद्दा पुराना लेकिन बहस हुई नई
छत्तीसगढ़ की धरती पर शराबबंदी का यह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा कोई नया नहीं है, बल्कि इसका अपना एक लंबा इतिहास रहा है। साल 2018 के ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में पूर्ण शराबबंदी का एक बहुत बड़ा और लोकलुभावन वादा किया था, जिसने उसे सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया था।
हालांकि, बाद में शराब की आड़ में हुए कथित 2000 करोड़ रुपये के एक बहुत बड़े सिंडिकेट घोटाले में कई बड़े राजनेता, नौकरशाह और बिचौलिए फंस गए। इस महाघोटाले की जांच वर्तमान में भी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राज्य की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा बहुत बारीकी से की जा रही है। यही मुख्य वजह है कि शराब का यह मुद्दा हर चुनाव, हर विधानसभा सत्र और हर बड़े राजनीतिक मौके पर नए तेवरों के साथ दोबारा जिंदा हो जाता है।
क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?
उपलब्ध राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सर्वे रिपोर्ट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ की लगभग 35.6 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में शराब का नियमित सेवन करती है। प्रति व्यक्ति खपत के इस चौंकाने वाले मामले में छत्तीसगढ़ को देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। साल-दर-साल बढ़ता राजस्व का यह ग्राफ भी इस बात की गवाही देता है:
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2019-20: 4,952 करोड़ रुपये
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2020-21: 4,636 करोड़ रुपये
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2021-22: 5,110 करोड़ रुपये
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2022-23: 6,783 करोड़ रुपये
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2023-24: 8,430 करोड़ रुपये
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2024-25: 10,145 करोड़ रुपये
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2025-26: 10,751 करोड़ रुपये
वर्तमान में पूरे प्रदेश में कुल 703 सरकारी शराब दुकानें पूरी रफ्तार के साथ संचालित हो रही हैं, जो इस विशाल वित्तीय तंत्र का मुख्य आधार स्तंभ हैं।
महिलाओं और सामाजिक संगठनों की गहरी चिंता
शराब की इस बेलगाम बिक्री को लेकर राज्य के विभिन्न सामाजिक संगठनों, प्रबुद्ध नागरिक मंचों और महिला स्व-सहायता समूहों के भीतर भारी चिंता और आक्रोश देखा जा रहा है। सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित पद्मश्री शमसाद बेगम ने इस पर अपनी गंभीर राय व्यक्त की है। उनका साफ कहना है कि शराब के अनियंत्रित प्रचलन के कारण प्रदेश के ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में घरेलू हिंसा, प्रताड़ना, दर्दनाक सड़क हादसे और गंभीर आपराधिक घटनाओं में भारी बाढ़ आ गई है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में दावा किया है कि यदि सरकार ने केवल राजस्व का लोभ छोड़कर समय रहते इस सामाजिक बुराई पर कानूनी रोक (शराबबंदी) नहीं लगाई, तो इसका बेहद विनाशकारी और घातक असर हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी पड़ना तय है।
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