TMC Crisis : तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा सत्ता का रस्साकशी अब खुले विद्रोह और निष्कासन के दौर में प्रवेश कर चुका है। मंगलवार को पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने बागी नेताओं के खिलाफ अपना कड़ा रुख दिखाते हुए फिरहाद हकीम सहित आठ बड़े नेताओं को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया। यह कठोर निर्णय सोमवार को बागी गुट द्वारा ममता बनर्जी को पार्टी चेयरपर्सन के पद से हटाने और खुद का नेतृत्व घोषित करने के ठीक एक दिन बाद आया है। निष्कासित नेताओं की सूची में फिरहाद हकीम के अलावा जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, सबीना यास्मीन, अरूप बिस्वास और स्नेहाशीष चक्रवर्ती जैसे प्रभावशाली नाम शामिल हैं, जो अब तक पार्टी का मजबूत स्तंभ माने जाते थे।

कारण बताओ नोटिस के बाद सख्त कदम
पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए ममता बनर्जी के गुट ने इससे पहले इन नेताओं को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया था। उन पर जानबूझकर पार्टी की छवि खराब करने और गुटबाजी को बढ़ावा देने का आरोप था। जब इन नेताओं ने पार्टी की मुख्यधारा से अलग जाकर अपने समानांतर ढांचे की घोषणा की, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य हो गई। टीएमसी के इस आधिकारिक खेमे का मानना है कि बागियों का कदम न केवल पार्टी के संविधान का उल्लंघन है, बल्कि यह जनता के बीच पार्टी की विश्वसनीयता को कमजोर करने का एक सुनियोजित प्रयास है।

ऋतब्रत बनर्जी की नई लीडरशिप और ममता के प्रति विद्रोह
पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने अपने समर्थकों के साथ टीएमसी में एक नई नेतृत्व संरचना की घोषणा कर दी। बागी खेमे ने एक विशेष सत्र आयोजित किया, जिसमें अनुभवी विधायक अरूप रॉय को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुन लिया गया। इस नई 30 सदस्यीय नेशनल वर्किंग कमेटी (NWC) में फिरहाद हकीम और अरूप बिस्वास जैसे नेताओं को वाइस-चेयरपर्सन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। बागी गुट का दावा है कि उनका यह फैसला सर्वसम्मति से लिया गया है और वे भविष्य में जिला स्तर पर भी अपनी नई समितियां गठित करेंगे।
बागी गुट का दावा: 60 विधायकों का समर्थन और बदलता सियासी समीकरण
बागी नेताओं का दावा है कि वर्तमान में तृणमूल के 80 में से कम से कम 60 विधायकों का उन्हें गुप्त समर्थन हासिल है। उनके अनुसार, पार्टी की संगठनात्मक शक्ति तेजी से उनके पाले में खिसक रही है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 पहले ही अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ चुके हैं। हालांकि, ममता बनर्जी ने अपने निष्कासन के दांव से इस पूरे विद्रोही ढांचे को चुनौती दी है। अब देखना यह होगा कि क्या ममता बनर्जी पार्टी की कमान पूरी तरह अपने हाथ में बनाए रख पाएंगी या फिर बागियों का यह ‘नया नेतृत्व’ टीएमसी के इतिहास में एक नया विभाजन दर्ज करेगा। सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि आगामी दिनों में दोनों गुटों के बीच पार्टी के प्रतीक चिह्न और नाम को लेकर कानूनी लड़ाई और तेज हो सकती है।
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