Gautam Adani Case : अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने भारतीय उद्योगपति गौतम अदाणी और उनके सहयोगियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को बंद करने के अपने निर्णय का संघीय अदालत में कड़ा बचाव किया है। न्याय विभाग ने एक 10 पन्नों के तीखे हलफनामे के माध्यम से संघीय न्यायाधीश निकोलस गराउफिस के समक्ष अपनी बात रखी है। विभाग का तर्क है कि यह मुकदमा कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था और इसे शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था। न्याय विभाग ने कहा है कि अभियोग वापस लेने के फैसलों पर न्यायिक पूछताछ करना कार्यपालिका के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है और इससे विभाग की गोपनीय आंतरिक चर्चाएं उजागर हो सकती हैं। यह हलफनामा न्यायाधीश गराउफिस की उस टिप्पणी के बाद आया है, जिसमें उन्होंने विभाग के पिछले आवेदन को ‘अस्पष्ट’ और ‘निष्कर्षहीन’ बताया था।

क्या था 2024 का पूरा मामला?
गौरतलब है कि साल 2024 में बाइडन प्रशासन के तहत न्याय विभाग ने अदाणी और अन्य पर भारतीय अधिकारियों को 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने और निवेशकों से झूठ बोलकर अरबों डॉलर जुटाने का आरोप लगाया था। आरोप था कि अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड ने इस योजना के तहत अमेरिकी निवेशकों से 17.5 करोड़ डॉलर से अधिक की राशि जुटाई थी। अब विभाग का कहना है कि यह मामला ‘न्याय के हित में’ नहीं था। प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉटटर के अनुसार, बचाव पक्ष के वकीलों के साथ लंबी चर्चा और व्यापक दस्तावेजों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इस मामले को खारिज करना कोई कठिन निर्णय नहीं था। विभाग ने साफ किया है कि अब वे मामले वापस लेने की प्रक्रिया में किसी भी तरह की न्यायिक बाधा या जवाबदेही के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

मामले को वापस लेने के छह प्रमुख आधार
न्याय विभाग ने मामले को खारिज करने के पीछे छह प्रमुख कारण गिनाए हैं। सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि यह मामला पूरी तरह से ‘विदेशी’ है, क्योंकि कथित गतिविधि भारत में हुई और इसमें शामिल लोग भी भारतीय नागरिक हैं। विभाग का कहना है कि भारत सरकार ने भी इस मामले में कोई दंडनीय अपराध नहीं पाया है। इसके अलावा, अमेरिका ने स्पष्ट किया कि संबंधित निवेशकों को कोई वास्तविक वित्तीय नुकसान नहीं हुआ है, क्योंकि प्रतिभूतियों का भुगतान या तो पूरा हो चुका है या समय पर जारी है। साथ ही, साक्ष्य और गवाह विदेश में होने के कारण अमेरिका में इनका परीक्षण करना संसाधनों की बर्बादी है। डीओजे ने यह भी माना कि अमेरिका का खुद को ‘दुनिया का पुलिसकर्मी’ समझना कूटनीतिक तनाव पैदा करता है, जिसे अब प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
कानूनी और कूटनीतिक प्राथमिकताओं का बदलाव
न्याय विभाग ने आगे तर्क दिया कि प्रतिभूति धोखाधड़ी (Securities Fraud) के आरोप कानूनी रूप से बेहद कमजोर थे, क्योंकि कथित गतिविधियां अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के दायरे में नहीं आती थीं। विभाग के अनुसार, यह मामला अधिकतम एक दीवानी विवाद (Civil Dispute) हो सकता था, लेकिन इसे आपराधिक मामला बनाना एक गंभीर भूल थी। विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (FCPA) से जुड़े आरोपों पर विभाग ने जून 2025 के एक ज्ञापन का हवाला देते हुए कहा कि ये मुद्दे अब उनकी प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं हैं। अंत में, न्याय विभाग ने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले को तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाए ताकि कूटनीतिक संबंधों में सुधार हो और विभाग अपने सीमित संसाधनों को घरेलू प्राथमिकताओं पर केंद्रित कर सके।
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