Strait of Hormuz : दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की ईरान की योजना ने वैश्विक ऊर्जा और शिपिंग बाजारों में हलचल मचा दी है। ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए 60 दिनों के अस्थायी युद्धविराम समझौते के तहत फिलहाल जहाजों की आवाजाही बिना किसी शुल्क के हो रही है। हालांकि, तेहरान अब इस जलमार्ग पर स्थायी रूप से ‘सर्विस फीस’ लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह कदम वैश्विक व्यापार को प्रभावित करेगा।

‘टोल नहीं, सर्विस चार्ज है’: बीजिंग में स्पष्ट हुआ ईरान का पक्ष
बीजिंग में आयोजित ‘वर्ल्ड पीस फोरम’ के दौरान चीन में ईरान के राजदूत अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने ओमान के साथ मिलकर तैयार किए जा रहे इस नए फ्रेमवर्क की पुष्टि की है। राजदूत ने इसे ‘टोल’ या ‘टैक्स’ मानने के बजाय ‘सर्विस चार्ज’ करार दिया है। उनका तर्क है कि चूंकि होर्मुज का एक बड़ा हिस्सा ईरान के क्षेत्रीय जलक्षेत्र (Territorial Waters) में आता है, इसलिए सुरक्षा निगरानी, नेविगेशन सहायता और भारी जहाजों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए यह शुल्क आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन के विरोध के बावजूद वे इस व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

संकट के साथियों के लिए ‘स्पेशल कंसीडरेशन’ का वादा
ईरानी राजदूत फजली ने चीन और भारत जैसे सहयोगी देशों को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान उन देशों के प्रति विशेष नीति (Special Considerations) अपनाएगा जिन्होंने कठिन समय में ईरान का मजबूती से साथ दिया है। यह बयान भारतीय व्यापारिक जगत के लिए राहत की खबर है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आयात करता है। ईरान का यह रुख स्पष्ट करता है कि वे अपने मित्र राष्ट्रों को इस वित्तीय बोझ से बचाने के लिए एक लचीली नीति अपनाएंगे।
भारत के लिए क्यों है सुरक्षित मार्ग का महत्व
भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य किसी जीवन रेखा से कम नहीं है। दुनिया के कुल कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) निर्यात का लगभग 20% हिस्सा इसी संकरे मार्ग से गुजरता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा भाग खाड़ी देशों से इसी रास्ते के माध्यम से आयात करता है। पूर्व में भी ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने यह आश्वस्त किया था कि तमाम भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारतीय टैंकरों को ईरान को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ा है। उन्होंने दोहराया था कि भारत और ईरान के हित गहरे जुड़े हुए हैं और भारतीय जहाजों को भविष्य में भी इस रणनीतिक जलमार्ग से ‘सुरक्षित मार्ग’ (Safe Passage) मिलना जारी रहेगा।
भविष्य की चुनौतियां और भारत की कूटनीतिक स्थिति
अमेरिकी विरोध और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनियों के बावजूद, ईरान और ओमान इस मार्ग को संयुक्त रूप से संचालित करने के लिए एक नई कार्यप्रणाली तैयार कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हो रहे इन बदलावों के बीच, भारत की कूटनीतिक सक्रियता रंग लाती दिख रही है। ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि नई दिल्ली को ईरान से जो आश्वासन मिले हैं, वे भारतीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखने में मददगार साबित होंगे। अब सभी की निगाहें ईरान की अंतिम शुल्क संरचना की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं, जिसमें भारत के लिए रियायतों का स्पष्ट उल्लेख होने की प्रबल संभावना है।
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