Ram Mandir Politics : पिछले तीन दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर का मुद्दा केवल एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक पहचान का मुख्य आधार रहा है। अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह राजनीतिक अध्याय अब अपने अंतिम चरण में है। लेकिन, हाल ही में राम मंदिर में चढ़ावे और प्रबंधन में अनियमितताओं के आरोपों ने एक बार फिर सियासत को गरमा दिया है। विपक्ष ने इन आरोपों को एक बड़ा हथियार बनाते हुए श्रद्धालुओं की आस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के नाम पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस और सपा की नई रणनीतिक चाल
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) को यह स्पष्ट हो गया है कि यदि भाजपा की सबसे मजबूत वैचारिक जमीन पर सवाल उठाए जाएं, तो यूपी की सियासत में नए समीकरण जन्म ले सकते हैं। कांग्रेस अब इस मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपना रही है। पार्टी के नेता आस्था का सम्मान करते हुए मंदिर प्रबंधन की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं। अयोध्या में नेताओं की सक्रियता और प्रेस कॉन्फ्रेंस का दौर इसी नई रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस को एहसास है कि 2027 के विधानसभा चुनावों में प्रासंगिक होने के लिए केवल भाजपा का विरोध पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे भावनात्मक और सामाजिक मुद्दों की आवश्यकता है जो जनमानस को सीधे प्रभावित करें।

राहुल गांधी की बदली हुई राजनीतिक दिशा
राहुल गांधी की राजनीति में आया बदलाव कांग्रेस की नई कार्ययोजना को दर्शाता है। संविधान, सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा अब कांग्रेस की मूल नीति बन चुका है। पार्टी अब हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता की पुरानी और घिसी-पिटी बहस से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय और धार्मिक आस्था के समन्वय पर काम कर रही है। राजेंद्र पाल गौतम को यूपी कांग्रेस का प्रभारी बनाना इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसका सीधा लक्ष्य दलित और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक को लुभाना है। कांग्रेस को विश्वास है कि बसपा के कमजोर पड़ने से खाली हुई जगह को वे भर सकते हैं।

सपा का ‘PDA’ मॉडल और भाजपा की चुनौती
समाजवादी पार्टी भी अखिलेश यादव के ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ इसी राह पर आगे बढ़ रही है। राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर सपा का लगातार हमला यह संकेत देता है कि विपक्ष अब भाजपा को केवल प्रशासनिक विफलताओं पर नहीं, बल्कि उसके अभेद्य वैचारिक गढ़ में चुनौती देना चाहता है। हालांकि, विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा की अभेद्य संगठनात्मक ताकत है। पिछले एक दशक में भाजपा ने सरकारी योजनाओं, सूक्ष्म बूथ प्रबंधन और हिंदुत्व की राजनीति के जरिए दलित व पिछड़े समाज के बीच गहरी पैठ बनाई है।
आने वाले विधानसभा चुनाव की राह
निस्संदेह, विपक्षी दलों का प्रयास भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का है, लेकिन भाजपा के संगठनात्मक आधार और हिंदुत्व की लहर को केवल नारों या चुनावी दावों से कमजोर करना एक अत्यंत कठिन कार्य है। राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर शुरू हुई यह राजनीति 2027 के विधानसभा चुनावों तक कितना असर दिखा पाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या विपक्ष अपनी सामाजिक न्याय की रणनीति से भाजपा की संगठनात्मक ताकत को मात दे पाएगा, या फिर भाजपा अपनी पुरानी रणनीति से फिर से वापसी करेगी? यह आने वाले समय में स्पष्ट हो जाएगा।












