Ram Mandir Donation Case : अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रामलला के चरणों में अर्पित होने वाले चढ़ावे की चोरी को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा खुलासा सामने आया है। जांच से जुड़े सूत्रों और समीक्षकों का मानना है कि मंदिर में हुई यह आर्थिक हेराफेरी शुरुआती आशंकाओं से कई गुना अधिक विशाल हो सकती है। अब तक सामने आई कहानी के अनुसार, यह माना जा रहा था कि चढ़ावा चोरी का यह सिलसिला पिछले वर्ष के शुरुआती महीनों में तब शुरू हुआ, जब मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी थी।

लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि इस पूरे महाघोटाले की पटकथा बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी। इस साजिश के तार सीधे तौर पर इस पूरे मामले के मुख्य सूत्रधार और मास्टरमाइंड अनुकल्प मिश्र के राम मंदिर की प्रबंधकीय व्यवस्था में प्रवेश करने से जुड़े हुए हैं।

प्राण प्रतिष्ठा से पहले ही व्यवस्था में घुसा मास्टरमाइंड अनुकल्प मिश्र
इस पूरे मामले को लेकर आम जनता और मीडिया में एक सामान्य धारणा बनी हुई थी कि अनुकल्प मिश्र और उसके अन्य साथी केवल कैश मैनेजमेंट (नकद प्रबंधन) के नए नियमों के तहत ही मंदिर की व्यवस्था का हिस्सा बने थे। लोगों का मानना था कि जब श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी और चढ़ावे की राशि में भारी इजाफा हुआ, तब इन लोगों को काम पर रखा गया था। परंतु, अंदरूनी सूत्रों से प्राप्त सच इसके बिल्कुल विपरीत और हैरान करने वाला है। मुख्य आरोपी अनुकल्प मिश्र 22 जनवरी 2024 को आयोजित हुए रामलला के भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह से काफी पहले ही किसी न किसी तरह राम मंदिर की आंतरिक व्यवस्था में पैठ बना चुका था।
मुख्य आयोजनों में बनाई पैठ, साजिश के लिए पहले से तलाश रहा था जमीन
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, अनुकल्प मिश्र ने बेहद शातिर तरीके से राम मंदिर के शिखर पर प्रतिष्ठित झंडा फहराने की पावन रस्म, रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगांठ के विशेष आयोजनों और अयोध्या के प्रसिद्ध दीपोत्सव जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील कार्यक्रमों में एक सक्रिय सहयोगी के रूप में अपनी जगह बना ली थी। अपने शातिर दिमाग, छिपे हुए एजेंडे और लालची प्रवृत्ति के अनुरूप, अनुकल्प ने उसी शुरुआती दौर से ही रामजन्मभूमि परिसर के भीतर अपने अवैध कारनामों को अंजाम देने के लिए जमीनी संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी थीं। वह बस एक सही मौके के इंतजार में था ताकि मंदिर की मुख्य वित्तीय व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सके।
अपने गिरोह का विस्तार कर एसबीआई की प्राइवेट कैश एजेंसी में लगाई सेंध
जैसे-जैसे मंदिर परिसर की व्यवस्था और रसूखदार लोगों के बीच अनुकल्प मिश्र का प्रभाव बढ़ता गया, उसने अपनी ताकत और साजिश को और मजबूत करने के लिए अपने करीबियों का एक पूरा नेटवर्क तैयार कर लिया। उसने धीरे-धीरे मंदिर परिसर के अलग-अलग कार्यों में अविनाश, लवकुश मिश्र, रमाशंकर मिश्र और करुणेश पांडेय जैसे अपने भरोसेमंद साथियों को भी शामिल करवा लिया। इसके बाद जब राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा चढ़ावे के कैश मैनेजमेंट के लिए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के माध्यम से एक निजी आउटसोर्सिंग एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने की बारी आई, तो अनुकल्प को अपनी बरसों पुरानी साध पूरी होती दिखाई दी। उसने अपने इसी प्रभाव का गलत इस्तेमाल करके अपने पूरे गिरोह को सीधे तौर पर कैश काउंटिंग और कैश मैनेजमेंट के काम में तैनात करवा दिया।
रसूखदारों की सिफारिशों का खेल और एसबीआई की लापरवाही का फायदा
इस पूरे खेल में केवल अनुकल्प का गिरोह ही सक्रिय नहीं था, बल्कि कुछ अन्य लोगों ने भी रसूख का फायदा उठाया। टिन्नू यादव नामक व्यक्ति ने रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय के साथ अपनी निकटता का अनुचित लाभ उठाया और वह कैश मैनेजमेंट तथा चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया में एक निर्णायक भूमिका में आ गया। प्रभाव जमाते ही उसने तुरंत अपने सगे भतीजे मनीष को भी इसी महत्वपूर्ण काम पर लगवा दिया। वहीं, इस मामले में सह-आरोपी सुभाष श्रीवास्तव को ट्रस्ट के एक अन्य वरिष्ठ सदस्य डॉ. अनिल मिश्र की सिफारिश के आधार पर काम पर रखा गया था।
हालांकि, नियमों के मुताबिक कैश मैनेजमेंट के लिए जनशक्ति (मैनपावर) नियुक्त करने का अंतिम अधिकार पूरी तरह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास था, लेकिन बैंक के पास उस समय तत्काल रूप से पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध नहीं थे। इसी मजबूरी का फायदा उठाते हुए ट्रस्ट के पदाधिकारियों के सुझाव पर इन कथित स्वयंसेवियों को सीधे खजाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। रामजन्मभूमि परिसर के समीक्षकों का दृढ़ता से मानना है कि एसबीआई के संयोजन में पिछले साल औपचारिक व्यवस्था शुरू होने के बहुत पहले से ही अनुकल्प का यह संगठित गिरोह रामलला के चढ़ावे पर लगातार अपना हाथ साफ कर रहा था।
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