Sonam Wangchuk Protest : राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों एक बेहद गंभीर और जटिल मानवीय संकट का केंद्र बना हुआ है। मशहूर पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब अपने 17वें दिन में प्रवेश कर चुका है। उनकी मांगें स्पष्ट हैं: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) के तहत संवैधानिक सुरक्षा मिले और देश में लगातार हो रहे पेपर लीक (NEET/CBSE) के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। 17 दिनों के इस संघर्ष ने वांगचुक के स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार, उनका वजन 8 किलोग्राम तक घट चुका है और उनके शरीर का ‘मसल मास’ तेजी से कम हो रहा है, जो उनके समर्थकों और देश के युवाओं के लिए चिंता का विषय है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और आंदोलन का अनूठा स्वरूप
इस आंदोलन का नेतृत्व अभिजीत दिपके कर रहे हैं, जो एक समय आम आदमी पार्टी से जुड़े थे। उन्होंने इस साल की शुरुआत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का गठन किया। यह नाम भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी से प्रेरित था। CJP का दर्शन पारंपरिक राजनीतिक दलों के लेबल से दूर रहकर युवाओं और छात्रों को एक मंच पर लाना है।

शुरुआत में इस मंच ने किसी भी स्थापित राजनीतिक दल को आने से मना कर दिया था, क्योंकि उनका मानना है कि आज की शिक्षा व्यवस्था और लद्दाख के हालात के लिए सत्ता और विपक्ष, दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। हालांकि, सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए, CJP ने अब अपना रुख थोड़ा उदार किया है। अब वे सभी दलों का स्वागत करते हैं, लेकिन एक शर्त के साथ—राजनेता अपना दल का झंडा बाहर छोड़कर आएं और उनके हाथों में केवल देश का तिरंगा हो।
केंद्र सरकार का रुख और तीखी प्रतिक्रियाएं
इस 17 दिनों के लंबे आंदोलन के बावजूद, केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर से अब तक बातचीत के लिए कोई औपचारिक पहल नहीं की गई है। सरकार ने इस पूरे मामले को एक कड़े और आक्रामक दृष्टिकोण से देखा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आंदोलनकारियों को लेकर तीखी भाषा का प्रयोग किया है। वहीं, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने इस आंदोलन से जुड़े लोगों और CJP को ‘देश को बांटने की कोशिश करने वाली वायरस और कॉकरोच जैसी पार्टियां’ तक कह दिया है। जब अभिजीत दिपके ने वांगचुक से अनशन तोड़ने की भावुक अपील की, तो वांगचुक का जवाब स्पष्ट था: “मुझसे अनशन तोड़ने को मत कहिए। सरकार से पूछिए कि वह संवाद करने से क्यों कतरा रही है?” सरकार की इस चुप्पी को आंदोलनकारी एक अहंकार की लड़ाई और अमानवीय रवैया मान रहे हैं।
राहुल गांधी की अनुपस्थिति और कांग्रेस की अपनी रणनीति
विपक्ष के नेता राहुल गांधी की जंतर-मंतर से दूरी भी चर्चा का बड़ा विषय बनी हुई है। यद्यपि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संसद के भीतर पेपर लीक के मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से इस मंच पर आने से परहेज किया है। उन्होंने अपने घर पर सीबीएसई घोटाले से प्रभावित कुछ छात्रों से मुलाकात जरूर की, लेकिन जंतर-मंतर पर वांगचुक से मिलने नहीं पहुंचे। कांग्रेस अब ‘छात्रों की गूंज’ नाम से अपना एक अलग अभियान चला रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस वांगचुक या CJP के बैनर के नीचे जाने के बजाय अपना स्वतंत्र प्रभाव बनाना चाहती है। राहुल गांधी के वर्तमान में विदेश दौरे पर होने के कारण कांग्रेस के कई छात्र प्रदर्शन टाल दिए गए हैं, जिसे लेकर बीजेपी ने उन पर कटाक्ष भी किया है।
2011 का ‘अन्ना आंदोलन’ बनाम 2026 का ‘कॉकरोच आंदोलन’
इस विरोध प्रदर्शन की तुलना स्वाभाविक रूप से 2011 के अन्ना हजारे के ‘जन लोकपाल आंदोलन’ से हो रही है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा और स्वयं अभिजीत दिपके ने भी इस अंतर को रेखांकित किया है। 2011 में जब तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे, तो सरकार ने सम्मानजनक बातचीत की पेशकश की थी। हालांकि आज की स्थिति भिन्न है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि 2026 की सत्ता और राजनीति में ‘मानवीय संवेदनाओं’ की जगह कम हो गई है और इसे सीधे तौर पर अहंकार का विषय बना दिया गया है। सोनम वांगचुक खुद को ‘आधुनिक गांधी’ कहलाने या किसी के उत्तराधिकारी बनने के लेबल से दूर रखते हैं। उनका कहना है कि वे केवल एक चिंतित नागरिक के नाते अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं।
विपक्ष का समर्थन और 20 जुलाई का ‘संसद मार्च’
भले ही राहुल गांधी मंच पर न आए हों, लेकिन इंडिया गठबंधन के कई दिग्गज नेताओं ने इस आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया है। महुआ मोइत्रा (TMC), उद्धव ठाकरे (शिवसेना UBT), आतिशी (AAP) और वामपंथी नेताओं ने वांगचुक की मांगों को जायज ठहराया है। अरविंद केजरीवाल ने फोन करके उनका हाल-चाल लिया है। आंदोलन की अगली बड़ी कड़ी 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद तक होने वाला मार्च है। CJP ने घोषणा की है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन वे सड़क पर उतरकर सरकार को मजबूर करेंगे। शिवसेना (UBT) ने भी ऐलान किया है कि वे इस मुद्दे को संसद के भीतर जोरदार तरीके से उठाएंगे और महाराष्ट्र में समानांतर प्रदर्शन करेंगे।
युवाओं में बढ़ता अविश्वास
सोनम वांगचुक का यह आंदोलन अब केवल लद्दाख की मांगों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह देश के सत्ता तंत्र और विपक्ष की राजनीति के बीच एक बड़ा ‘लिटमस टेस्ट’ बन गया है। यदि सरकार संवाद के दरवाजे नहीं खोलती और विपक्ष केवल अपनी राजनीति करता रहा, तो युवाओं के भीतर पारंपरिक राजनीति के प्रति अविश्वास की खाई और गहरी हो जाएगी। जंतर-मंतर का यह मंच अब युवाओं के असंतोष का प्रतिबिंब बन चुका है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि क्या सरकार झुकती है या देश का युवा किसी नई क्रांति की ओर कदम बढ़ाता है। युवाओं की यह लड़ाई अब सिर्फ शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा बचाने की भी है।












