Economic Crisis : थोक महंगाई बढ़ते ही सियासत गरमाई, कांग्रेस ने पीएम मोदी से मांगा जवाब

देश में थोक महंगाई के 44 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कांग्रेस ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे जवाब देने की मांग की है। आखिर महंगाई के नए आंकड़े क्या कहते हैं और विवाद क्यों बढ़ा? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Economic Crisis : देश में थोक मुद्रास्फीति (WPI) के आंकड़ों ने एक बार फिर केंद्र सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जून के महीने में थोक महंगाई दर बढ़कर 9.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनविरोधी और त्रुटिपूर्ण आर्थिक नीतियों के कारण देश एक गंभीर आर्थिक संकट की ओर तेजी से अग्रसर है। विपक्षी दल ने बढ़ती महंगाई को सरकार की पूर्ण विफलता करार देते हुए प्रधानमंत्री से सीधा जवाब मांगा है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार इन भयावह आंकड़ों को छिपाने का प्रयास कर रही है, लेकिन जनता की समस्याओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

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जयराम रमेश ने गिनाए सरकार की विफलता के प्रमुख कारण

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था ‘रेड अलर्ट’ मोड पर है। उन्होंने आंकड़ों के हवाले से बताया कि पिछले 44 महीनों में यह थोक मुद्रास्फीति का उच्चतम स्तर है। रमेश के अनुसार, ईंधन और बिजली की कीमतों में 27.4 प्रतिशत की भारी वृद्धि ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि जहां एक ओर आम जनता महंगाई और बेरोजगारी के बोझ तले दबी हुई है, वहीं दूसरी ओर देश के किसान भी सरकारी नीतियों और प्रतिकूल मौसम की दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गंभीर मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय केवल ध्यान भटकाने वाली सुर्खियां बटोरने में व्यस्त है।

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खेती, उद्योग और आम जनता पर महंगाई का चौतरफा प्रहार

महंगाई की इस मार का असर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जून में खाद्य मुद्रास्फीति 5.49 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो मई में 3.60 प्रतिशत थी। इसका मुख्य कारण अल नीनो के प्रभाव से हुई बारिश की कमी और कृषि बुवाई का तीन साल के निचले स्तर पर आना है। उद्योगों के लिए स्थिति और भी कठिन हो गई है, क्योंकि थोक महंगाई बढ़ने से परिचालन लागत (Operational Cost) में भारी बढ़ोतरी हुई है। गैर-खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति में भी 11.07 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने व्यापारिक माहौल को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

सरकार का आर्थिक कुप्रबंधन या वैश्विक परिस्थितियां?

कांग्रेस ने इन आंकड़ों को मोदी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का जीवंत प्रमाण बताया है। पार्टी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि 12 वर्षों के शासन के बाद, अब प्रधानमंत्री को अपनी आर्थिक विफलताओं की जिम्मेदारी लेनी ही होगी। हालांकि मई के मुकाबले ईंधन और बिजली की महंगाई में मामूली कमी आई है, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति नियंत्रण से बाहर दिख रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएगी, या देश को और अधिक महंगाई के लिए तैयार रहना होगा। समाज का हर वर्ग फिलहाल राहत की उम्मीद कर रहा है, जबकि विपक्ष ने सरकार को घेरे में लेकर जवाबदेही तय करने की मांग तेज कर दी है।

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