Kharif Sowing 2026 : देश के कई हिस्सों में इस वर्ष कमजोर मानसून का प्रभाव अब कृषि क्षेत्र में साफ दिखाई देने लगा है। केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी कि सामान्य से कम बारिश के कारण खरीफ फसलों की बुवाई में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। सरकार का कहना है कि फिलहाल बुवाई का काम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, इसलिए अंतिम आंकड़े अभी आने बाकी हैं। हालांकि यदि मौजूदा स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं होता, तो इसका असर खाद्यान्न उत्पादन, आपूर्ति और खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है। विशेष रूप से दाल, चावल और खाद्य तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

संसद में सरकार ने दी खरीफ बुवाई की जानकारी
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि 13 जुलाई 2026 तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 38.82 लाख हेक्टेयर कम रही। उनके अनुसार उस समय तक कुल 787.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई थी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 826.19 लाख हेक्टेयर था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि खरीफ सीजन की बुवाई उस समय जारी थी और अंतिम आंकड़ों में बदलाव संभव है। इसलिए वर्तमान आंकड़ों को अंतिम स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।

उत्तर भारत के कई राज्यों में सामान्य से कम हुई बारिश
कृषि मंत्रालय ने संसद को बताया कि 1 जून से 29 जुलाई 2026 के बीच उत्तर भारत के कई राज्यों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। पंजाब में सामान्य से 33 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि हरियाणा में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश में वर्षा 24 प्रतिशत कम रही और राजस्थान में 16 प्रतिशत कम बारिश हुई। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश सहित अन्य क्षेत्रों में भी मानसून सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच सका। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं होने से खेतों में बुवाई की गति प्रभावित हुई है।
कम बुवाई से खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका
सरकार ने संसद में खाद्य पदार्थों की कीमतों को लेकर कोई प्रत्यक्ष अनुमान नहीं दिया है, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बुवाई का रकबा कम बना रहता है और उत्पादन प्रभावित होता है, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। धान की कम बुवाई होने पर चावल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जबकि दलहन और तिलहन के कम रकबे का असर दाल और खाद्य तेल की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। हालांकि अंतिम स्थिति अगस्त और सितंबर में होने वाली बारिश, कुल बुवाई और प्रति हेक्टेयर उत्पादन पर निर्भर करेगी।
इन राज्यों में सबसे अधिक घटी खरीफ बुवाई
सरकारी आंकड़ों के अनुसार खरीफ बुवाई में सबसे बड़ी गिरावट महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक में दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में लगभग 15.70 लाख हेक्टेयर, राजस्थान में 15.46 लाख हेक्टेयर और कर्नाटक में 13.41 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई। इसके अलावा गुजरात में 6.31 लाख हेक्टेयर तथा मध्य प्रदेश में 4.94 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, बिहार और असम जैसे कुछ राज्यों में पिछले वर्ष की तुलना में अधिक क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है, जिससे कुछ हद तक संतुलन बनने की उम्मीद जताई जा रही है।

मानसून पर लगातार नजर रख रही है सरकार
कृषि मंत्रालय ने बताया कि भारतीय मौसम विभाग (IMD), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), केंद्रीय जल आयोग और राज्य सरकारों के साथ मिलकर मानसून की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। राज्यों को कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों के बीज उपलब्ध कराने, बीज भंडार सक्रिय रखने और आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक फसल योजना लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा देश के 342 जिलों के लिए कृषि आकस्मिक योजनाओं को भी अपडेट किया गया है, ताकि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में किसानों को नुकसान कम हो।
राहत और सहायता को लेकर सरकार का स्पष्ट रुख
सरकार ने संसद में यह भी स्पष्ट किया कि प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में राहत उपलब्ध कराना राज्य सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए राज्यों को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से सहायता दी जाती है और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) से अतिरिक्त वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया जा सकता है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि यह सहायता राहत कार्यों के लिए होती है, इसे सीधे फसल नुकसान के मुआवजे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और आवश्यकता के अनुसार आगे भी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
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