Indore Water Tragedy: देश के सबसे स्वच्छ शहर का गौरव रखने वाले इंदौर से एक विचलित करने वाली खबर सामने आई है। जिस शहर की सड़कों, मैदानों और बुनियादी ढांचे की मिसाल पूरे देश में दी जाती है, वहां पीने के पानी ने ही मासूम लोगों की जान ले ली। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने की वजह से अब तक 17 लोगों की दुखद मृत्यु हो चुकी है। इस त्रासदी ने न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं, बल्कि शहर की ‘नंबर 1’ वाली छवि को भी गहरा धक्का पहुंचाया है। स्थानीय निवासियों में इस लापरवाही को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है।
Indore Water Tragedy : हाई कोर्ट का सख्त रुख: ‘इंदौर जैसे शहर में ऐसी घटना हैरान करने वाली’
इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए इंदौर हाई कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण सुनवाई की। कोर्ट में भागीरथपुरा त्रासदी से संबंधित तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं। सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों ने मध्य प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि इंदौर जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध स्वच्छ शहर में ऐसी घटना होना बेहद गंभीर और हैरानी की बात है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तरह की लापरवाही से इंदौर की वैश्विक छवि धूमिल होगी और इसके लिए जवाबदेही तय करना अनिवार्य है।
Indore Water Tragedy: मुख्य सचिव को समन: 15 जनवरी को देनी होगी सफाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को तलब किया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि 15 जनवरी को मुख्य सचिव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। अदालत ने कहा कि वे इस मामले में सीधे प्रशासन के शीर्ष अधिकारी से बात करना चाहते हैं, क्योंकि दूषित पानी और बीमारियों की यह समस्या अब किसी एक मोहल्ले तक सीमित नहीं रह गई है। कोर्ट का मानना है कि जल वितरण प्रणाली में किसी बड़ी खामी की वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं।
अस्पतालों में हाहाकार: 400 से ज्यादा लोग बीमार, 17 ने तोड़ा दम
भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों में दूषित पानी का कहर इस कदर टूटा कि अब तक 400 से अधिक मरीजों को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा है। हालांकि, राहत की बात यह है कि इनमें से कई लोगों के स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया है, लेकिन 17 परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया है। यह त्रासदी तब हुई जब कुछ ही दिन पहले, 31 दिसंबर 2025 को, हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार और नगर निगम को यह सख्त निर्देश दिया था कि प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रशासनिक विफलता पर सवाल: क्या स्वच्छता केवल दिखावा है?
इस घटना ने नगर निगम की उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें जल निकासी और शुद्ध पेयजल आपूर्ति के बड़े-बड़े वादे किए जाते थे। प्रारंभिक जांच में सीवेज लाइन और पेयजल पाइपलाइन के आपस में मिल जाने की आशंका जताई जा रही है। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि बुनियादी ढांचे के रखरखाव में बरती गई कोताही ही इन मौतों की जिम्मेदार है। अब सबकी निगाहें 15 जनवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए उनके पास क्या ठोस कार्ययोजना है।
















