NEET Protest : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती के आरोपों को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाएगी। इस पैनल में सेवानिवृत्त न्यायाधीश, पूर्व डीजीपी, पूर्व सीबीआई निदेशक और अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है। कोर्ट का उद्देश्य प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं की स्वतंत्र जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना है।
बुधवार को समिति के गठन का आदेश संभव
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि समिति में शामिल किए जाने वाले अन्य संभावित सदस्यों के नाम को लेकर सभी संबंधित पक्षों से सुझाव लिए जाएंगे। इन सुझावों पर विचार करने के बाद बुधवार को समिति के गठन से संबंधित औपचारिक आदेश जारी किया जा सकता है।
20 जुलाई के संसद मार्च की फुटेज भी जांचेगी कमेटी
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि 20 जुलाई को दिल्ली में हुए संसद मार्च से जुड़े वीडियो फुटेज और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को भी जांच समिति को सौंपा जाएगा। इन रिकॉर्डिंग के जरिए प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं और पुलिस की कार्रवाई की परिस्थितियों को समझने की कोशिश की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार या उन्हें निशाना बनाए जाने की शिकायतों की भी जांच की जाएगी।
महिला प्रदर्शनकारियों की शिकायतों पर भी होगी पड़ताल
पीठ के सामने यह आरोप भी आया कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में विरोध मार्च के दौरान कुछ महिला प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर निशाना बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित समिति इन शिकायतों को भी अपनी जांच के दायरे में रखेगी। इससे यह साफ है कि अदालत केवल हिंसा या तोड़फोड़ के आरोपों पर ही नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई से जुड़ी शिकायतों के हर पहलू को देखना चाहती है।
छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR का मांगा ब्यौरा
सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से उन एफआईआर की जानकारी मांगी, जिनमें छात्र प्रदर्शनकारियों को आरोपी बनाया गया है और जिन्हें बंद या रद्द किया जाना प्रस्तावित है। अदालत के इस कदम से संकेत मिला कि वह जरूरत पड़ने पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है। इस प्रावधान के तहत सुप्रीम कोर्ट पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी कर सकता है।
कोर्ट ने कहा- छात्रों का भविष्य दांव पर
सुनवाई के दौरान पीठ ने छात्रों के भविष्य को लेकर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि छात्रों की जिंदगी दांव पर है और उनका भविष्य अभी सामने है। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत नागरिकों को विरोध और अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई जब एक वकील बिना माफी के छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले वापस लेने का विरोध कर रहा था।
तुषार मेहता ने पुलिस की कार्रवाई का रखा पक्ष
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि पुलिस ने 2,800 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की है, जिन्हें उन्होंने असामाजिक तत्व बताया। उनके अनुसार, इनमें कई लोग पहले गंभीर अपराधों में शामिल रहे हैं और 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं। सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि सभी प्रदर्शनकारियों को एक समान नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।
आपराधिक इतिहास को लेकर कोर्ट ने पहले दिया था स्पष्टीकरण
इस मामले में 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश को स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा था कि छात्र प्रदर्शनकारियों को रिहा करने के आदेश में इस्तेमाल किया गया “आपराधिक इतिहास” शब्द केवल गंभीर और जघन्य अपराधों में शामिल लोगों पर लागू होता है। बाकी छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को कानून के अनुसार बंद करने या वापस लेने पर राज्य सरकारें विचार कर सकती हैं।
केंद्र ने भी मामलों को आगे नहीं बढ़ाने की बात कही थी
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण केंद्र सरकार के उस रुख के बाद आया था, जिसमें उसने कहा था कि वह उन छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को आगे नहीं बढ़ाने को लेकर गंभीर है, जिन्होंने NEET परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। इसमें 20 जुलाई का दिल्ली संसद मार्च भी शामिल था। हालांकि, यह राहत उन छात्रों के लिए बताई गई थी जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी स्पष्ट किया है कि केवल विरोध-प्रदर्शन करने के आधार पर पुलिस की ज्यादती या लाठीचार्ज को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने के नागरिक अधिकार को महत्वपूर्ण बताया है। अब प्रस्तावित हाई-पावर कमेटी की जांच से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि 20 जुलाई के घटनाक्रम में पुलिस की कार्रवाई निर्धारित नियमों और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप थी या नहीं।
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