US Election 2026: अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले मेल के जरिए मतदान को लेकर बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को फिलहाल राहत देते हुए उस कार्यकारी आदेश को लागू करने का रास्ता साफ कर दिया है, जिसमें मेल वोटिंग पर नए प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, अदालत ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आदेश संवैधानिक और कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है या नहीं।
राज्यों की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज
सुप्रीम कोर्ट के कंजर्वेटिव बहुमत वाले न्यायाधीशों ने राज्यों की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता राज्य यह साबित नहीं कर सके कि ट्रंप के आदेश से उन्हें तत्काल और प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचा है। अदालत के मुताबिक, आदेश को अभी पूरी तरह लागू नहीं किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यों की याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि प्रशासन की ओर से उठाया जाने वाला हर कदम स्वतः कानूनी माना जाएगा।
आगे भी कानूनी चुनौती का रास्ता खुला
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में संकेत दिया गया कि ट्रंप प्रशासन द्वारा आदेश को लागू करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की वैधता को भविष्य में चुनौती दी जा सकती है। यानी मौजूदा फैसला मेल वोटिंग पर अंतिम कानूनी मुहर नहीं है। इस मामले में आगे भी अदालतों में सुनवाई और कानूनी लड़ाई जारी रहने की संभावना है। तीन उदारवादी न्यायाधीशों ने फैसले से असहमति जताई।
जस्टिस जैक्सन ने जताई आपत्ति
जस्टिस केतनजी ब्राउन जैक्सन ने फैसले पर कड़ी असहमति व्यक्त की। उन्होंने इसे चुनाव से जुड़े मामलों में पहले से मौजूद कानूनी जटिलताओं को और बढ़ाने वाला निर्णय बताया। उनके मुताबिक, मतदान प्रक्रिया से जुड़े नियमों में चुनाव से ठीक पहले बदलाव करना गंभीर सवाल खड़े कर सकता है और राज्यों की चुनाव व्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।
ट्रंप के कार्यकारी आदेश में क्या है?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च में एक कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसके तहत प्रशासन को मेल से वोट डालने के पात्र मतदाताओं की सूची तैयार करने और अमेरिकी डाक सेवा को केवल सूची में शामिल मतदाताओं तक मेल बैलेट पहुंचाने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया था। आदेश का पालन नहीं करने वाले राज्यों से मेल बैलेट भेजने पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना जताई गई थी।
मेल वोटिंग पर लंबे समय से ट्रंप के सवाल
डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से अमेरिका की मेल वोटिंग व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका दावा रहा है कि डाक के जरिए मतदान से चुनाव में धोखाधड़ी की संभावना बढ़ती है। हालांकि, बड़े पैमाने पर मेल वोटिंग में व्यापक चुनावी धोखाधड़ी के उनके दावों को साबित करने वाला ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
23 राज्यों ने किया था विरोध
ट्रंप के आदेश के खिलाफ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले 23 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इन राज्यों का तर्क था कि चुनाव कराने और मतदान के नियम तय करने का अधिकार मुख्य रूप से राज्यों और कांग्रेस के पास है। उन्होंने चेतावनी दी कि चुनाव से कुछ समय पहले मेल वोटिंग के नियमों में बड़े बदलाव करने से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
निचली अदालतों में अलग-अलग फैसले
इस मामले में निचली अदालतों के फैसले भी एक जैसे नहीं रहे हैं। कुछ अदालतों ने ट्रंप के आदेश पर रोक लगाई है, जबकि कुछ अन्य अदालतों ने प्रशासन के लिए इसे लागू करने का रास्ता खुला रखा है। इस विरोधाभास के कारण मामले में आगे भी कानूनी सुनवाई की संभावना बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इसी व्यापक कानूनी विवाद का एक अहम पड़ाव माना जा रहा है।
चुनाव से पहले बढ़ी चिंता
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव अब करीब हैं और कई राज्यों में चुनाव संबंधी तैयारियां तेज हो चुकी हैं। कुछ राज्यों में सितंबर की शुरुआत से विदेशों में रहने वाले अमेरिकी नागरिकों और सैन्य मतदाताओं को बैलेट भेजने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। ऐसे में मेल वोटिंग के नियमों में अंतिम समय पर बदलाव चुनाव अधिकारियों के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है।
2024 में करीब 30 फीसदी वोट मेल से पड़े
अमेरिका में मेल वोटिंग पिछले कुछ वर्षों में काफी लोकप्रिय हुई है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में करीब 30 प्रतिशत मतदाताओं ने मेल बैलेट के जरिए मतदान किया था। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले नियमों में बदलाव बड़ी संख्या में मतदाताओं और चुनाव अधिकारियों को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप प्रशासन को फिलहाल आगे बढ़ने का अवसर मिला है, लेकिन मेल वोटिंग पर अंतिम कानूनी फैसला अभी बाकी है।
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