Subhash Chandra NCLT : मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया से जुड़ा नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का फैसला चर्चा में है। मामले में चंद्रा पर कुल 22,006.57 करोड़ रुपये का कर्ज बताया गया था, जबकि उनके लिए 6.5 करोड़ रुपये का सेटलमेंट प्लान पेश किया गया। NCLT ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके परिणामस्वरूप कर्जदाताओं को उनके दावों की तुलना में बेहद कम राशि प्राप्त होगी। इस फैसले ने दिवालिया कानून और कर्जदाताओं के अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
22 हजार करोड़ के कर्ज के मुकाबले महज 6.5 करोड़ का प्रस्ताव
सेटलमेंट प्लान के आंकड़ों पर नजर डालें तो कुल कर्ज और प्रस्तावित भुगतान के बीच बहुत बड़ा अंतर है। करीब 22 हजार करोड़ रुपये के दावे के मुकाबले केवल 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है। कॉर्पोरेट और दिवालिया प्रक्रिया की भाषा में कर्ज की इस तरह की कटौती को ‘हेयरकट’ कहा जाता है। इस मामले में कर्जदाताओं को अपने दावों की तुलना में बेहद मामूली रकम मिलने की स्थिति बनी है।
IBC की धारा 114 के तहत आया फैसला
इस मामले में फैसला इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 114 के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद आया। मूल रूप से सुनवाई कर रही दो सदस्यीय NCLT बेंच में प्रस्ताव को लेकर एकमत नहीं बन सका था। इसके बाद नीलेश शर्मा को तीसरे न्यायिक सदस्य के रूप में शामिल किया गया। उनके फैसले के बाद सेटलमेंट प्लान को मंजूरी मिलने का रास्ता साफ हुआ।
LIC Housing Finance ने प्लान पर जताई थी आपत्ति
इस मामले में LIC Housing Finance प्रमुख विरोध करने वाले कर्जदाताओं में शामिल था। कंपनी का सुभाष चंद्रा के खिलाफ 1,322.39 करोड़ रुपये का दावा बताया गया। हालांकि, मंजूर योजना के तहत उसे केवल 38.09 लाख रुपये मिलने की बात सामने आई है। यह राशि उसके कुल दावे की तुलना में बेहद कम है। LIC Housing Finance ने ट्रिब्यूनल के सामने इस योजना को अव्यावहारिक और कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी।
NCLT ने कर्जदाताओं के वोटिंग पैटर्न को माना अहम
ट्रिब्यूनल के सामने इस योजना के समर्थन और विरोध का वोटिंग पैटर्न भी महत्वपूर्ण रहा। NCLT के अनुसार, योजना का विरोध करने वाले कर्जदाताओं का संयुक्त वोटिंग शेयर 20 प्रतिशत से कम था। दूसरी ओर, करीब 80.81 प्रतिशत वोटिंग शेयर रखने वाले कर्जदाताओं ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। इसी बहुमत के आधार पर योजना को मंजूरी देने का निर्णय लिया गया।
निजी संपत्ति से जुड़ी रिपोर्ट ने भी निभाई भूमिका
रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्तियों का मूल्य 6.5 करोड़ रुपये से भी कम आंका गया था। इसी तथ्य को भी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना गया। NCLT ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्जदाताओं द्वारा किसी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करना उनका व्यावसायिक निर्णय यानी ‘कमर्शियल विजडम’ है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि वह कर्जदाताओं के ऐसे व्यावसायिक फैसले में सामान्य तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
मंजूर योजना सभी कर्जदाताओं पर होगी लागू
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि योजना को मंजूरी मिलने के बाद उसके प्रावधान सभी संबंधित कर्जदाताओं पर लागू होंगे। IBC की धारा 115 का हवाला देते हुए NCLT ने स्पष्ट किया कि मंजूर सेटलमेंट प्लान से बंधे पक्ष अलग से वसूली की कार्रवाई नहीं कर सकते। यानी जिन संस्थानों ने योजना का विरोध किया था, उन्हें भी स्वीकृत व्यवस्था के तहत ही आगे बढ़ना होगा।
अब अंतिम सूची और औपचारिक आदेश की प्रक्रिया
फैसले के बाद रेजोल्यूशन प्रोफेशनल को संबंधित कर्जदाताओं और उनके दावों की अंतिम सूची तैयार करनी है। इसके बाद मूल बेंच की ओर से आवश्यक औपचारिक आदेश जारी किया जाएगा। इस प्रक्रिया के पूरा होने के साथ व्यक्तिगत दिवालिया समाधान योजना को लागू करने की दिशा में आगे की कार्रवाई होगी।
ZEEL के शेयरों में भी दिखी हलचल
इसी घटनाक्रम के बीच शेयर बाजार में जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के शेयरों में तेजी देखने को मिली। गुरुवार को कंपनी का शेयर करीब 0.43 प्रतिशत बढ़कर 104.85 रुपये के स्तर पर कारोबार करता बताया गया। पिछले छह महीनों में शेयर में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़त भी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
फैसले ने दिवालिया कानून पर फिर छेड़ी बहस
सुभाष चंद्रा के मामले ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि बड़े कर्जदारों के मामलों में दिवालिया कानून किस तरह काम करता है और कर्जदाताओं के हितों की सुरक्षा कितनी प्रभावी है। वहीं, NCLT के फैसले का आधार कानूनी प्रक्रिया, बहुमत से स्वीकृत योजना और कर्जदार की उपलब्ध संपत्तियों से जुड़ी परिस्थितियों पर रहा। ऐसे में इस मामले को लेकर आगे भी कानूनी और वित्तीय बहस जारी रहने की संभावना है।
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