POCSO Case Verdict : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल स्कूल के प्रवेश रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर किसी पीड़िता की नाबालिग उम्र को अंतिम रूप से साबित नहीं माना जा सकता। खासतौर पर तब, जब अभियोजन यह प्रमाणित करने में विफल रहे कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि किस मूल दस्तावेज या स्रोत के आधार पर दर्ज की गई थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की।
हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि और सजा की निरस्त
डिवीजन बेंच ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366 और POCSO अधिनियम की धारा 6 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अभियोजन ने पीड़िता को बताया था नाबालिग
मामले में अभियोजन का आरोप था कि आरोपी नाबालिग पीड़िता को अपने साथ ले गया और उसके साथ यौन संबंध बनाए। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील पर सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि घटना के समय पीड़िता की उम्र वास्तव में 18 वर्ष से कम थी या नहीं।
स्कूल रिकॉर्ड और आठवीं की मार्कशीट पर था भरोसा
अभियोजन ने पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर और कक्षा आठवीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि पर भरोसा किया था। इन दस्तावेजों में जन्मतिथि जुलाई 2005 दर्ज बताई गई थी। अभियोजन का तर्क था कि इन रिकॉर्ड के आधार पर पीड़िता को घटना के समय नाबालिग माना जाना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता और उनके आधार की बारीकी से जांच की।
शिक्षक को भी जन्मतिथि दर्ज होने का स्रोत नहीं पता था
सुनवाई के दौरान संबंधित सहायक शिक्षक से जिरह की गई। शिक्षक ने स्वीकार किया कि जन्मतिथि की संबंधित प्रविष्टि उन्होंने स्वयं नहीं की थी। इसके अलावा उन्हें यह जानकारी भी नहीं थी कि स्कूल रिकॉर्ड में उक्त जन्मतिथि किस दस्तावेज या सूचना के आधार पर दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना और कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी की मूल पुष्टि आवश्यक है।
माता-पिता भी पीड़िता की सही उम्र नहीं बता सके
कोर्ट ने यह भी पाया कि पीड़िता के माता-पिता उसकी वास्तविक जन्मतिथि से परिचित नहीं थे। वे केवल उसकी उम्र लगभग 14 वर्ष होने की बात बता सके। अभियोजन की ओर से कोई जन्म प्रमाण-पत्र अथवा अन्य प्राथमिक और विश्वसनीय दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि का मूल आधार साबित हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हाईकोर्ट ने दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष पर पहुंचने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि किसी दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लेना, उसमें दर्ज हर तथ्य की सत्यता को स्वतः प्रमाणित नहीं करता। स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि का साक्ष्य मूल्य तब कमजोर हो जाता है, जब उस प्रविष्टि के मूल स्रोत या आधार को प्रमाणित नहीं किया गया हो।
मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की भी हुई जांच
डिवीजन बेंच ने मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों का भी परीक्षण किया। मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर और जननांग क्षेत्र पर किसी बाहरी या आंतरिक चोट के निशान नहीं मिले। वहीं FSL रिपोर्ट में भी सीमन स्टेन और मानव शुक्राणु पाए जाने की पुष्टि नहीं हुई। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल नकारात्मक FSL रिपोर्ट आरोपी की निर्दोषता साबित नहीं करती, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह अभियोजन के आरोपों की पुष्टि भी नहीं करती।
पीड़िता की गवाही पर भी अदालत ने किया विचार
अदालत ने पीड़िता की गवाही का भी विस्तार से मूल्यांकन किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है। हालांकि, इस मामले में गवाही में मौजूद विसंगतियों और घटनाक्रम से जुड़ी परिस्थितियों के कारण अदालत को आवश्यक स्तर का विश्वास नहीं हुआ।
संदेह का लाभ देकर आरोपी को किया गया बरी
सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पीड़िता की उम्र और आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। ऐसी स्थिति में आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना जरूरी है। इसी आधार पर कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही निर्देश दिया गया कि यदि वह किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
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