Cauliflower Farming : हरी सब्जियों की खेती में अच्छी पैदावार और बेहतर आमदनी के लिए सही किस्म का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। मौसम के अनुसार उन्नत बीजों की बुवाई और समय पर पौध रोपाई करने से किसान कम अवधि में बाजार तक फसल पहुंचा सकते हैं। सितंबर का महीना फूलगोभी की अगेती और मध्य अवधि वाली किस्मों की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस समय पौध तैयार करने वाले किसानों को शुरुआती सर्दियों में बाजार में अच्छी मांग का लाभ मिल सकता है।
त्योहारों के आसपास बढ़ सकती है फूलगोभी की मांग
अगेती फूलगोभी की फसल यदि सही समय पर तैयार हो जाए तो दिवाली और शुरुआती ठंड के दौरान मंडियों में इसकी आवक शुरू हो सकती है। इस अवधि में कई क्षेत्रों में ताजी फूलगोभी की आपूर्ति सीमित रहती है, जबकि उपभोक्ता मांग बढ़ जाती है। ऐसे में किसानों को बेहतर बाजार भाव मिलने की संभावना रहती है। हालांकि वास्तविक कीमत मंडी, गुणवत्ता, आवक और स्थानीय मांग के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
पूसा केतकी और पूसा दीपाली का करें चयन
सितंबर में फूलगोभी की खेती करने वाले किसानों के लिए पूसा केतकी और पूसा दीपाली जैसी किस्में उपयोगी विकल्प हो सकती हैं। इन किस्मों का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI से जुड़ा है। पूसा केतकी को अपेक्षाकृत कम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों में गिना जाता है। रोपाई के लगभग 60 से 70 दिन बाद इसकी फसल कटाई के लिए तैयार हो सकती है।
सफेद और गठीले फूल से मिलता है बाजार में फायदा
पूसा केतकी के फूल सामान्यतः सफेद, मध्यम आकार के और ठोस होते हैं। अच्छी गुणवत्ता होने पर इन्हें थोक और खुदरा बाजार में बिक्री के लिए उपयुक्त माना जाता है। वहीं पूसा दीपाली भी अपेक्षाकृत कम समय में तैयार होने वाली किस्म है। यह हल्की गर्मी और उमस वाली परिस्थितियों में भी खेती के लिए उपयोगी मानी जाती है। उचित जल निकासी और देखभाल के साथ किसान अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
पूसा शरद और काशी कुंवारी भी बेहतर विकल्प
मध्य सीजन की फूलगोभी की खेती के लिए पूसा शरद और काशी कुंवारी जैसी किस्मों पर भी किसान विचार कर सकते हैं। सितंबर के दूसरे पखवाड़े में पौध तैयार करने वालों के लिए ये किस्में उपयोगी हो सकती हैं। पूसा शरद के फूल अपेक्षाकृत भारी और ठोस होते हैं। यह किस्म करीब 80 से 85 दिनों में कटाई योग्य हो सकती है और बदलते तापमान में भी बेहतर प्रदर्शन के लिए जानी जाती है।
रोगों से बचाव में मददगार है काशी कुंवारी
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान यानी IIVR से जुड़ी काशी कुंवारी किस्म को भी किसान मध्य सीजन में अपना सकते हैं। इसकी खासियतों में रोगों के प्रति बेहतर सहनशीलता शामिल है। पौधे की पत्तियां फूल को ढककर रखती हैं, जिससे तेज धूप के कारण फूल का रंग प्रभावित होने का खतरा कम हो सकता है। इससे बाजार में फसल की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है।
खेत की तैयारी में इन बातों का रखें ध्यान
गोभी की खेती में सिर्फ अच्छी किस्म का चुनाव ही पर्याप्त नहीं है। खेत की तैयारी और रोपाई की तकनीक भी उत्पादन को प्रभावित करती है। रोपाई से पहले खेत की दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा करें। इसके बाद प्रति एकड़ अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता सुधारने में मदद मिल सकती है।
मेड़ पर रोपाई से जलभराव का खतरा होगा कम
सितंबर में बारिश की संभावना को देखते हुए फूलगोभी की पौध को मेड़ यानी रिज एंड फरो विधि से लगाना उपयोगी हो सकता है। सामान्य तौर पर पौधे से पौधे की दूरी करीब 45 सेंटीमीटर और कतारों के बीच लगभग 60 सेंटीमीटर रखने की सलाह दी जाती है। इससे खेत में जल निकासी बेहतर रहती है और जड़ों के आसपास पानी जमा होने की समस्या कम होती है।
संतुलित खाद और पोषण से बढ़ेगी फसल की गुणवत्ता
पौध की रोपाई शाम के समय करना और उसके बाद हल्की सिंचाई देना उपयोगी रहता है। फसल में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग मिट्टी की स्थिति और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना चाहिए। फूल बनने की अवस्था में सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ की सलाह से बोरॉन और मोलिब्डेनम का प्रयोग किया जा सकता है। सही किस्म, उचित समय और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान फूलगोभी की खेती से बेहतर उत्पादन और बाजार लाभ हासिल कर सकते हैं।
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