South Korea Hormuz Crisis : अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के बीच दक्षिण कोरिया ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सैन्य बल तैनात करने से इनकार कर दिया है। राष्ट्रपति ली जे-म्यांग ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि सियोल मध्य पूर्व के संघर्ष में सीधे शामिल होने वाला कोई कदम नहीं उठाना चाहता। उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया की प्राथमिकता क्षेत्रीय तनाव से दूर रहते हुए अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को सुरक्षित रखना है।
अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने फैसले पर कायम सियोल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान संघर्ष में सैन्य सहयोग बढ़ाने का दबाव बनाए जाने के बावजूद दक्षिण कोरिया ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। राष्ट्रपति ली जे-म्यांग ने संकेत दिया कि सियोल फिलहाल होर्मुज में सैनिक भेजने के फैसले पर विचार नहीं कर रहा है। दक्षिण कोरिया का कहना है कि ऐसा कदम उसे सीधे संघर्ष में खींच सकता है।
व्यापारिक जहाजों और तेल मार्गों की सुरक्षा पर जोर
हालांकि, राष्ट्रपति ली ने यह भी स्पष्ट किया कि सेना तैनात नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि दक्षिण कोरिया समुद्री सुरक्षा को लेकर निष्क्रिय रहेगा। सियोल कमर्शियल जहाजों और तेल परिवहन के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर संघर्ष के संभावित प्रभाव को सीमित करना है।
होर्मुज मार्ग से जुड़ा है दक्षिण कोरिया का बड़ा तेल आयात
होर्मुज जलडमरूमध्य दक्षिण कोरिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, देश अपने आयातित तेल का करीब 63 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से प्राप्त करता है। ऐसे में इस समुद्री क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव या आवाजाही में बाधा आने से दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और औद्योगिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सियोल की बढ़ी चिंता
मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ने के साथ दक्षिण कोरिया के सामने दोहरी चुनौती पैदा हुई है। एक तरफ उसे अपने ऊर्जा आयात और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी तरफ किसी सैन्य कार्रवाई के जरिए संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचना है। इसी वजह से सियोल सैन्य तैनाती के बजाय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा के लिए सीमित कदमों पर जोर दे रहा है।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया के रिश्ते कई दशक पुराने
अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच लंबे समय से मजबूत सैन्य और रणनीतिक साझेदारी है। दोनों देशों के बीच सात दशक से अधिक समय से सुरक्षा सहयोग कायम है। उत्तर कोरिया से जुड़े सुरक्षा मुद्दों के कारण दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और संयुक्त अभ्यास भी महत्वपूर्ण रहे हैं। हालांकि, हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों की प्राथमिकताओं में कुछ अंतर सामने आए हैं।
ईरान मुद्दे पर दोनों देशों की प्राथमिकताएं अलग
अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और सहयोगी देशों से समर्थन की अपेक्षा के बीच दक्षिण कोरिया का रुख अलग दिखाई दे रहा है। सियोल मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने से बचना चाहता है। वहीं, वाशिंगटन अपने सहयोगियों से क्षेत्रीय सुरक्षा प्रयासों में अधिक भूमिका निभाने की अपेक्षा कर रहा है। इस अंतर ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक चर्चा को महत्वपूर्ण बना दिया है।
उल्ची फ्रीडम शील्ड अभ्यास में भी बदलाव
दोनों देशों के सैन्य संबंधों में हालिया बदलावों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास भी चर्चा में रहा है। पिछले अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेंटागन को अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच होने वाले वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘उल्ची फ्रीडम शील्ड’ को काफी कम करने का आदेश दिया था। ट्रंप ने इसके लिए अभ्यास की लागत को एक वजह बताया था।
उत्तर कोरिया के संदर्भ में भी उठे सवाल
संयुक्त सैन्य अभ्यास में कटौती के फैसले पर जानकारों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। कुछ विशेषज्ञों और सूत्रों ने इसे उत्तर कोरिया के संदर्भ में संभावित रूप से उकसावे वाला संकेत बताया। अमेरिका और दक्षिण कोरिया के संयुक्त सैन्य अभ्यास लंबे समय से उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता का हिस्सा रहे हैं।
आगे अमेरिका की प्रतिक्रिया पर रहेगी नजर
ईरान संघर्ष के बीच दक्षिण कोरिया के ताजा फैसले से अमेरिका और सियोल के बीच रणनीतिक बातचीत का एक नया पहलू सामने आया है। राष्ट्रपति ली जे-म्यांग ने फिलहाल होर्मुज में सैन्य बल भेजने से इनकार करते हुए व्यापारिक जहाजों और तेल परिवहन की सुरक्षा पर जोर दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि अमेरिकी प्रशासन दक्षिण कोरिया के इस रुख पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है और दोनों सहयोगी देश क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर आगे किस रणनीति पर सहमत होते हैं।
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