SIR Controversy : विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद सामने आने की एक रिपोर्ट ने राजनीतिक बहस तेज कर दी है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने सहित चुनावी सूची की प्रक्रिया से जुड़े मामलों पर थीं।
तीन सदस्यीय आयोग में CEC ज्ञानेश कुमार
वर्तमान तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, SIR की निगरानी तीनों आयुक्तों की जिम्मेदारी के तहत हो रही है, लेकिन संधू और जोशी ने कुछ फैसलों पर असहमति दर्ज की। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा कि निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे।
13 करोड़ से ज्यादा नामों का मुद्दा
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। हालांकि, ड्राफ्ट सूची से नाम हटना अंतिम रूप से मतदान का अधिकार समाप्त होना नहीं है। संबंधित मतदाताओं के लिए दावे और आपत्तियां दाखिल करने तथा पात्रता साबित होने पर नाम बहाल कराने की प्रक्रिया मौजूद है। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे 13 करोड़ लोगों के मतदान अधिकार खत्म होने के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
नए मतदाताओं के पंजीकरण पर भी आपत्ति
रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का एक प्रमुख मुद्दा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 से जुड़ा बताया गया है। इसमें SIR से संबंधित सवाल जोड़े गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि वैधानिक Form-6 में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस रुख से सहमति जताई और बाद में बदलाव को हटाने की मांग की।
मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर चिंता
दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन का मुद्दा भी शामिल था। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, संधू और जोशी ने चुनावी डेटाबेस तक पहुंच के कथित केंद्रीकरण पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की जिम्मेदारी रखने वाले स्थानीय अधिकारियों की पहुंच प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
पश्चिम बंगाल में अपील प्रक्रिया पर सवाल
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के SIR से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है। वहां न्यायिक अधिकारियों द्वारा मतदाताओं से जुड़े मामलों पर फैसले दिए जाने के बाद अपील प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने यह जानने की मांग की कि कुछ मतदाताओं से संबंधित अपीलें चुनाव आयोग की ओर से किसने और किस अधिकार के तहत दायर कीं।
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान मांगा
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद CEC ज्ञानेश कुमार की ओर से संबंधित निर्देश जारी किए गए। भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से मामले का स्वतः संज्ञान लेने और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। ये भूषण के आरोप और राजनीतिक- कानूनी मांगें हैं, न कि अदालत द्वारा स्थापित निष्कर्ष।
दिल्ली SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
दिल्ली में भी SIR प्रक्रिया को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। 22 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने कहा कि कुछ मतदाताओं को भेजे गए नोटिस पहली नजर में “मैकेनिकल” तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं। अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा और प्रक्रिया में अतिरिक्त फिल्टर की संभावना पर विचार करने को कहा। दिल्ली में 33 लाख से अधिक मतदाताओं को अलग-अलग कारणों से नोटिस दिए जाने की रिपोर्ट है।
SIR प्रक्रिया पर जारी है कानूनी और राजनीतिक बहस
SIR को लेकर अब बहस केवल मतदाता सूची में बदलाव तक सीमित नहीं रही है। आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां, डिजिटल डेटाबेस की कार्यप्रणाली, नए मतदाताओं के पंजीकरण और नोटिस जारी करने की प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में हैं। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और अदालतों में होने वाली सुनवाई से इन विवादों की कानूनी स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
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