Election Commission Rift : मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटाबेस से जुड़े मुद्दों से था।
चुनाव आयोग के सूत्रों ने दावे पर दी सफाई
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग के सूत्रों ने इसके कुछ पहलुओं पर प्रतिक्रिया दी। सूत्रों के अनुसार, आयोग में SIR समेत सभी फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं और तीन सदस्यों में दो की सहमति होने पर निर्णय बहुमत का माना जाता है। आयोग के सूत्रों ने यह भी कहा कि SIR को लेकर कोई विवाद नहीं था और इस प्रक्रिया से जुड़े फैसले सहमति से लिए गए। वहीं, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कई मुद्दों पर दर्ज आपत्तियों का उल्लेख किया गया है।
SIR और चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर विपक्ष के सवाल
रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट से रिपोर्ट पर संज्ञान लेने की अपील भी की गई है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब SIR की प्रक्रिया को लेकर अदालतों में भी याचिकाएं और सुनवाई चल रही हैं। 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की सूची में दिल्ली SIR से संबंधित मामले की सुनवाई भी दर्ज थी।
संजय राउत ने CEC पर कार्रवाई की मांग की
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने केंद्र सरकार से कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि यदि सरकार कदम नहीं उठाती है, तो वह राष्ट्रपति से CEC को हटाने की अपील करेंगे। राउत ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनके बयान राजनीतिक आरोप और मांग हैं, जिन्हें स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
उदित राज ने SIR प्रक्रिया पर जताई चिंता
कांग्रेस नेता उदित राज ने भी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज किया जाना महत्वपूर्ण है। उन्होंने SIR और मतदाता सूची में नामों से जुड़ी समस्याओं का मुद्दा उठाया। उदित राज ने दावा किया कि कई लोगों के नाम मतदाता सूची में गलत तरीके से प्रभावित हुए हैं। ये उनके राजनीतिक दावे हैं और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े किसी स्वतंत्र निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।
मनीष तिवारी ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर रिपोर्ट को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि रिपोर्ट में बताए गए तथ्य सही हैं, तो चुनाव आयोग के संचालन और निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं। तिवारी ने यह भी पूछा कि ऐसी स्थिति में निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता को कैसे बहाल किया जाएगा। उनके बयान में महाभियोग की संभावना पर विचार करने की बात भी कही गई।
अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान की अपील की
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में 14 बार फैसलों पर आपत्ति दर्ज की है, तो यह गंभीर विषय है। यादव ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और उसके सदस्यों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग की।
चुनाव आयोग के फैसलों में बहुमत का क्या प्रावधान है?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों वाले आयोग में मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला लेने का कानूनी प्रावधान है। Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 में आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से चलाने और मतभेद होने पर बहुमत के अनुसार निर्णय लेने का प्रावधान बताया गया है।
SIR पर आगे भी जारी रह सकती है कानूनी बहस
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले बिहार में चुनावी सूची के विशेष पुनरीक्षण की वैधता पर अपना फैसला दे चुका है। अदालत ने उस मामले में निर्वाचन आयोग के SIR करने के अधिकार को बरकरार रखा था। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से प्रक्रिया, पारदर्शिता और आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों से संबंधित है। ऐसे में चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और अदालतों में लंबित मामलों के अगले चरण पर नजर बनी रहेगी।
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