Kiwi Farming : कीवी अंडाकार आकार का खट्टा-मीठा और रसीला फल है, जो अपने हरे रंग के गूदे के लिए पहचाना जाता है। इसकी मांग बाजार में लगातार बनी रहती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक हेक्टेयर जमीन से करीब 10 से 15 टन तक कीवी का उत्पादन हो सकता है। उत्पादन और बाजार भाव अनुकूल रहने पर किसान सालाना लगभग 10 से 15 लाख रुपये तक की सकल आय हासिल कर सकते हैं। हालांकि, इसकी खेती में शुरुआती वर्षों में धैर्य रखना जरूरी होता है।
फल आने में लगते हैं तीन से चार साल
कीवी की खेती करने वाले किसानों को तुरंत आमदनी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सामान्य तौर पर पौधों में फल आने में करीब तीन से चार साल लग सकते हैं। यानी खेत तैयार करने और पौधे लगाने के बाद शुरुआती अवधि में खर्च तो होता है, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में समय लगता है। इसलिए इसकी खेती शुरू करने से पहले किसान को लागत, स्थानीय बाजार, जलवायु और सिंचाई की उपलब्धता को ध्यान में रखकर योजना बनानी चाहिए।
कीवी में पाए जाते हैं कई पोषक तत्व
कीवी को पोषक तत्वों से भरपूर फलों में शामिल किया जाता है। इसमें विटामिन सी, विटामिन ई, फाइबर, पोटेशियम, कॉपर और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से ठंडे और अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में की जाती है। अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हैं।
ठंडी जलवायु कीवी के लिए मानी जाती है अनुकूल
कीवी के पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है। पौधों में आमतौर पर मई के आसपास फूल आने शुरू हो सकते हैं। इसके बाद मानसून के दौरान फल विकसित होने लगते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में अक्टूबर तक फल तुड़ाई के लिए तैयार हो सकते हैं। हालांकि, फल पकने और तुड़ाई का समय क्षेत्र, मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
दोमट मिट्टी में बेहतर हो सकती है खेती
कीवी की खेती के लिए खेत की मिट्टी का उचित प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है। खेत को पहले समतल करने के साथ मिट्टी में जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए। दोमट मिट्टी को इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। पौधे लगाने से पहले मिट्टी में जैविक खाद और अन्य आवश्यक सामग्री मिलाकर उसे तैयार किया जा सकता है। खेत में पानी का लंबे समय तक जमा रहना पौधों की जड़ों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
स्वस्थ पौधों का चुनाव जरूरी
अच्छे उत्पादन के लिए स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण पौधों का चयन करना जरूरी है। कीवी के पौधे तैयार करने के लिए बडिंग, ग्राफ्टिंग और लेयरिंग जैसी विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। पौध तैयार करने की प्रक्रिया में गुणवत्ता वाले पौध और स्वस्थ शाखाओं का इस्तेमाल महत्वपूर्ण होता है। किसानों को स्थानीय कृषि विशेषज्ञों या उद्यानिकी विभाग की सलाह के अनुसार उपयुक्त विधि का चयन करना चाहिए।
बडिंग, ग्राफ्टिंग और लेयरिंग से तैयार करें पौधे
बडिंग में चयनित कीवी पौधे की कलिका का उपयोग किया जाता है। ग्राफ्टिंग में उपयुक्त शाखा या रूटस्टॉक की मदद से पौध तैयार की जाती है, जबकि लेयरिंग में शाखा के एक हिस्से से जड़ विकसित कर नया पौधा तैयार किया जाता है। कौन-सी विधि बेहतर रहेगी, यह स्थानीय जलवायु, पौधे की किस्म और किसान के अनुभव पर निर्भर करता है। व्यावसायिक खेती में प्रमाणित नर्सरी से गुणवत्तापूर्ण पौध लेना भी उपयोगी हो सकता है।
पौधों की देखभाल में सिंचाई का रखें ध्यान
पौधे लगाने के बाद नियमित देखभाल बेहद जरूरी है। खेत में जलभराव नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि अधिक नमी से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। वहीं पौधों को पर्याप्त रोशनी भी चाहिए। सामान्य तौर पर पौधों के लिए रोजाना करीब छह से सात घंटे धूप की जरूरत बताई जाती है। गर्मियों में सिंचाई की आवश्यकता बढ़ सकती है, जबकि ठंड के मौसम में पानी की जरूरत अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
अच्छी कमाई के लिए करना होगा लंबा इंतजार
कीवी की खेती में सबसे बड़ी बात यह है कि किसान को शुरुआती वर्षों में धैर्य रखना पड़ता है। पौधों से व्यावसायिक फल उत्पादन शुरू होने में करीब तीन से चार साल लग सकते हैं। इसके बाद उत्पादन बढ़ने पर किसानों को बेहतर आमदनी का अवसर मिल सकता है। बाजार में कीवी की कीमत मांग, गुणवत्ता, मौसम और स्थान के अनुसार बदलती रहती है। किसान स्थानीय मंडी के साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी बाजार तलाश सकते हैं। खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा।
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