AI Survey : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल अब सिर्फ सवालों के जवाब देने, तस्वीरें बनाने या कंटेंट तैयार करने तक सीमित नहीं है। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच शोधकर्ता यह समझने की कोशिश भी कर रहे हैं कि क्या AI की मदद से किसी मुद्दे पर आम लोगों की राय का अनुमान लगाया जा सकता है। इसी सवाल को समझने के लिए Pew Research Center ने एक प्रयोग किया, जिसमें AI से वास्तविक सर्वे प्रतिभागियों की तरह जवाब देने को कहा गया। नतीजों से पता चला कि AI के अनुमान कई मामलों में वास्तविक लोगों की राय से अलग रहे।
वास्तविक लोगों के डिजिटल ट्विन तैयार किए गए
इस अध्ययन में AI मॉडल को वास्तविक सर्वे प्रतिभागियों के डिजिटल ट्विन के तौर पर तैयार किया गया। इसके लिए प्रतिभागियों की उम्र, जनसांख्यिकीय जानकारी और अन्य उपलब्ध विशेषताओं का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद इन AI प्रतिभागियों से वही सवाल पूछे गए, जिनका जवाब वास्तविक लोगों ने सर्वे में दिया था। रिसर्चर्स ने दोनों समूहों के जवाबों की तुलना करके यह समझने की कोशिश की कि AI कितनी सटीकता से इंसानी जनमत को दोहरा सकता है।
करीब 300 सवालों में दिखा औसतन 12 अंक का अंतर
Pew Research Center ने तीन पुराने सर्वे को दोबारा कराकर AI और वास्तविक प्रतिभागियों के जवाबों की तुलना की। लगभग 300 अलग-अलग सवालों में AI के जवाब और इंसानों के वास्तविक जवाबों के बीच औसतन करीब 12 प्रतिशत अंकों का अंतर पाया गया। लगभग 28 प्रतिशत सवालों में यह अंतर 15 प्रतिशत अंकों से ज्यादा था। कुछ सवालों पर दोनों के जवाबों में इससे भी बड़ा अंतर दिखाई दिया, जिससे AI आधारित सिंथेटिक सर्वे की सीमाएं सामने आईं।
अलग-अलग समूहों में AI का अनुमान रहा अलग
अध्ययन में यह भी देखा गया कि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों की राय का अनुमान लगाने में AI की सटीकता समान नहीं रही। रिपब्लिकन और रिपब्लिकन समर्थक प्रतिभागियों के लिए औसत अंतर करीब 16.1 प्रतिशत अंक रहा। डेमोक्रेट और डेमोक्रेट समर्थकों के मामले में यह अंतर करीब 13.6 प्रतिशत अंक था। ब्लैक वयस्कों के लिए औसत अंतर 15.1 प्रतिशत अंक और हिस्पैनिक वयस्कों के लिए करीब 13.9 प्रतिशत अंक दर्ज किया गया।
AI इंसानों की अनिश्चितता को नहीं दोहरा पाया
सर्वे में किसी व्यक्ति की राय के साथ उसकी निश्चितता भी महत्वपूर्ण होती है। कई बार लोग किसी सवाल का जवाब नहीं जानते या किसी मुद्दे पर अपनी राय को लेकर असमंजस में रहते हैं। ऐसे मामलों में वास्तविक प्रतिभागी ‘निश्चित नहीं’ या ‘पता नहीं’ जैसे विकल्प चुन सकते हैं। अध्ययन में AI प्रतिभागियों ने ऐसी अनिश्चितता को वास्तविक लोगों की तुलना में काफी कम प्रदर्शित किया। इससे पता चलता है कि केवल जवाबों का अनुमान लगाना इंसानी सोच की पूरी तस्वीर नहीं देता।
GPT और Claude के जवाबों में भी अंतर
रिसर्च में अलग-अलग AI मॉडल के प्रदर्शन की भी तुलना की गई। इसके लिए OpenAI के GPT-5.1 और Anthropic के Claude Opus 4.6 का इस्तेमाल किया गया। दोनों मॉडल कई सवालों पर वास्तविक लोगों की राय से मेल नहीं खा सके। इतना ही नहीं, कुछ मुद्दों पर दोनों AI मॉडलों के अनुमान भी एक-दूसरे से अलग रहे। इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि सिंथेटिक सर्वे के लिए किस मॉडल, डेटा और पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है।
AI उपयोगी तकनीक है, लेकिन मानव सर्वे जरूरी
रिसर्च का निष्कर्ष यह नहीं है कि AI डेटा रिसर्च के लिए उपयोगी नहीं है। AI बड़ी मात्रा में जानकारी को तेजी से व्यवस्थित और विश्लेषित करने में मदद कर सकता है। यह शोधकर्ताओं को संभावित पैटर्न और अलग-अलग परिस्थितियों को समझने में भी सहायता दे सकता है। लेकिन जब किसी समाज की वास्तविक राय, अनुभव, भावनाओं और अनिश्चितताओं को समझना हो, तब सीधे लोगों से सर्वे करना अभी भी महत्वपूर्ण है। अध्ययन से फिलहाल यही संकेत मिलता है कि AI आधारित सिंथेटिक प्रतिभागी पारंपरिक मानव सर्वे का पूर्ण विकल्प नहीं हैं।
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