Mission Shakti : करीब 28 साल पहले पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत ने 27 मार्च 2019 को मिशन शक्ति के जरिए अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का सफल प्रदर्शन किया था। अब अमेरिका के पूर्व वायुसेना खुफिया अधिकारी डेविड ग्रुश ने पॉडकास्टर जो रोगन के साथ बातचीत में उस दिन की घटनाओं को याद किया है। ग्रुश के मुताबिक, वह परीक्षण के समय अमेरिकी नेशनल रिकॉनिसेंस ऑफिस यानी NRO के ऑपरेशंस सेंटर में ड्यूटी पर थे।
अमेरिका को मिसाइल टेस्ट की जानकारी थी
ग्रुश ने बताया कि भारत की ओर से ओडिशा के तट के पास NOTAM जारी किया गया था। इससे अमेरिकी पक्ष को पता था कि भारत किसी मिसाइल परीक्षण की तैयारी कर रहा है। हालांकि, उनके अनुसार अमेरिकी खुफिया तंत्र को यह जानकारी नहीं थी कि परीक्षण का लक्ष्य अंतरिक्ष में मौजूद भारतीय उपग्रह होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाद में 27 मार्च की सुबह राष्ट्र के नाम संबोधन में मिशन शक्ति की घोषणा की थी।
तीन मिनट में पूरा हुआ मिशन शक्ति
मिशन शक्ति में DRDO के एंटी-सैटेलाइट इंटरसेप्टर ने भारत के एक उपग्रह को लो-अर्थ ऑर्बिट में निशाना बनाया। भारत सरकार के अनुसार परीक्षण सफल रहा और इसके साथ भारत ने उपग्रह को अंतरिक्ष में इंटरसेप्ट करने की स्वदेशी क्षमता प्रदर्शित की। इस उपलब्धि के बाद भारत अमेरिका, रूस और चीन के साथ ऐसी क्षमता प्रदर्शित करने वाले देशों के समूह में शामिल हुआ।
NRO में अचानक बढ़ गई गतिविधियां
ग्रुश के अनुसार, परीक्षण की जानकारी सामने आते ही NRO में अधिकारियों ने संभावित अंतरिक्ष मलबे का आकलन शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि उनकी चिंता इस बात को लेकर थी कि उपग्रह के टुकड़े अमेरिकी खुफिया उपग्रहों के लिए कोई जोखिम पैदा कर सकते हैं या नहीं। उन्होंने ऑर्बिटल एनालिस्टों से मलबे के संभावित फैलाव और किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यान की कक्षा बदलने की जरूरत का आकलन करने को कहा।
अमेरिकी दूतावास से भी किया गया संपर्क
पूर्व अधिकारी ने अपने पॉडकास्ट इंटरव्यू में बताया कि उस समय उन्होंने अलग-अलग फोन के जरिए संबंधित अधिकारियों और अमेरिकी दूतावास से संपर्क किया। इसके बाद वह NRO निदेशक को जानकारी देने के लिए पहुंचे। ग्रुश के मुताबिक, उस वक्त उनका मुख्य सवाल यही था कि परीक्षण से पैदा हुआ मलबा अमेरिकी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों के लिए कितना जोखिम पैदा कर सकता है।
भारत ने मलबे को लेकर दी थी सफाई
मिशन शक्ति के बाद भारत सरकार ने अंतरिक्ष मलबे को लेकर उठी चिंताओं पर कहा था कि परीक्षण लो-अर्थ ऑर्बिट में किया गया था। विदेश मंत्रालय के अनुसार, परीक्षण से उत्पन्न मलबा कुछ समय में पृथ्वी के वातावरण में वापस प्रवेश कर नष्ट हो जाएगा। सरकार ने यह भी कहा था कि भारत का उद्देश्य अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ शुरू करना नहीं है।
ग्रुश के दावे और आधिकारिक रिकॉर्ड में अंतर
ग्रुश ने अपने इंटरव्यू में लक्ष्य को एक निष्क्रिय मौसम उपग्रह बताया, लेकिन उपलब्ध भारतीय आधिकारिक जानकारी में मिशन के लिए इस्तेमाल उपग्रह को भारत का मौजूदा उपग्रह बताया गया था। बाद की रिपोर्टों में इसे Microsat-R के रूप में पहचाना गया। इसलिए ग्रुश के विवरण के कुछ हिस्सों को उनके व्यक्तिगत स्मरण के रूप में देखना जरूरी है।
मिशन शक्ति की जानकारी कितनी पहले थी?
ग्रुश की बातों से यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी अधिकारियों को मिसाइल परीक्षण की जानकारी थी, लेकिन परीक्षण के वास्तविक उद्देश्य का अनुमान नहीं था। हालांकि, उनके बयान से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भारत और अमेरिका के बीच उस समय किसी भी स्तर पर कोई पूर्व संचार नहीं हुआ था। उपलब्ध रिपोर्टों में भी इस पहलू को लेकर सीमाएं बताई गई हैं।
मिशन शक्ति बना भारत की अंतरिक्ष क्षमता का अहम पड़ाव
मिशन शक्ति भारत के अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी प्रदर्शन था। भारत सरकार ने इसे अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ी क्षमता के प्रदर्शन के तौर पर बताया था। वहीं डेविड ग्रुश का हालिया बयान इस घटना के अमेरिकी खुफिया तंत्र के भीतर देखे गए तत्काल प्रभाव और अंतरिक्ष मलबे के आकलन पर नई जानकारी सामने लाता है।
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