Diesel Crisis : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल और डीजल की कीमतों में तेजी ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच G7 देशों ने आने वाले हफ्तों में करीब 100 मिलियन यानी 10 करोड़ बैरल तेल और डीजल बाजार में जारी करने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य बढ़ी हुई कीमतों और सप्लाई संबंधी दबाव को कुछ हद तक कम करना है।
अमेरिका की मांग के बाद बढ़ा दबाव
इस फैसले के पीछे अमेरिका की ओर से बनाए गए दबाव को भी अहम माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यूरोपीय देशों से अपने रणनीतिक ईंधन भंडार का इस्तेमाल करने की अपील कर रहे थे। अमेरिका की ओर से यह संकेत भी दिया गया था कि अगर यूरोप डीजल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कदम नहीं उठाता है, तो अमेरिकी डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के विकल्प पर विचार किया जा सकता है।
ट्रंप के लिए ईंधन की कीमत बनी चुनौती
अमेरिका में बढ़ती ईंधन कीमतें घरेलू अर्थव्यवस्था और महंगाई को लेकर चर्चा का महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई हैं। ट्रंप ने यूरोपीय देशों से रिजर्व जारी करने की मांग की थी। G7 के फैसले के बाद उन्होंने यूरोप द्वारा बड़ी मात्रा में डीजल उपलब्ध कराने के कदम का स्वागत किया। साथ ही G7 देशों ने ऊर्जा और ऊर्जा उत्पादों के आपसी निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाने पर भी सहमति जताई है।
मिडटर्म चुनाव से पहले महंगाई का दबाव
3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले महंगाई का मुद्दा ट्रंप प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है। AP-NORC के सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था को लेकर ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर बताई गई है। ट्रंप ने यह भी कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए तेल की ऊंची कीमत एक स्वीकार्य कीमत है।
डीजल की कीमत में आ सकती है गिरावट
विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, बाजार में रिजर्व से ईंधन आने के बाद अमेरिका में डीजल की कीमत करीब 25 से 50 सेंट प्रति गैलन तक कम हो सकती है। हालांकि, कीमतों में वास्तविक गिरावट कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगी। इनमें वैश्विक मांग, उत्पादन, परिवहन मार्ग और मध्य-पूर्व की स्थिति प्रमुख हैं।
रूस से सप्लाई घटने का भी असर
डीजल की कीमत बढ़ने के पीछे रूस से जुड़ी सप्लाई में कमी भी एक कारण बताई जा रही है। यूक्रेन की ओर से ड्रोन हमलों के बाद रूस ने डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। यूरोपीय देश रूसी डीजल की खरीद नहीं करते, लेकिन तुर्की और लैटिन अमेरिका जैसे बाजार पहले रूस से ईंधन लेते थे। अब वहां से मांग का दबाव दूसरे सप्लायर्स और यूरोपीय बाजारों पर पड़ रहा है।
खाड़ी क्षेत्र में तनाव से सप्लाई प्रभावित
दूसरी बड़ी वजह अमेरिका-ईरान तनाव है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री परिवहन मार्गों पर दबाव बढ़ा है। कुछ महत्वपूर्ण रूट प्रभावित होने से बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। इसका सीधा असर कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधन की कीमतों पर देखा जा रहा है।
अमेरिकी डीजल एक्सपोर्ट पर नहीं लगेगा प्रतिबंध
कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने घरेलू बाजार में कीमतें कम करने के लिए अमेरिकी डीजल निर्यात पर रोक लगाने की मांग की थी। हालांकि, G7 देशों ने स्पष्ट किया है कि सदस्य देश एक-दूसरे के ऊर्जा निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे। ट्रंप ने भी कहा कि अमेरिका डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने वाला नहीं है।
विशेषज्ञों ने रिजर्व खत्म होने पर चेताया
राइस यूनिवर्सिटी के ऊर्जा विशेषज्ञ जिम क्रेन के अनुसार, रणनीतिक रिजर्व से ईंधन निकालने से अल्पावधि में कीमतों को राहत मिल सकती है, लेकिन इसका दीर्घकालिक जोखिम भी है। उनके मुताबिक, रिजर्व कम होने के बाद आपात स्थिति में सुरक्षा कवच घट सकता है और भविष्य में भंडार दोबारा भरने की लागत अधिक हो सकती है।
IEA के पुराने रिलीज प्लान से जुड़ा सवाल
मार्च में ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA के सदस्य देशों ने करीब 42.6 करोड़ बैरल तेल बाजार में जारी करने का वादा किया था। इसमें यूरोपीय संघ का हिस्सा लगभग 9.2 करोड़ बैरल बताया गया था। अब सवाल यह है कि G7 द्वारा घोषित 10 करोड़ बैरल की रिलीज उसी योजना का हिस्सा है या इसके अतिरिक्त नई आपूर्ति होगी। इसका स्पष्ट जवाब सामने आने के बाद ही कुल अतिरिक्त सप्लाई का आकलन किया जा सकेगा।
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