Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत शुक्रवार को राजस्थान के ऐतिहासिक शहर जैसलमेर पहुंचे। उनका यह दौरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोहन भागवत ने जैसलमेर के डेडांसर मेला ग्राउंड पर आयोजित ‘परम पूज्य दादा श्री जिनदत्त सूरिजी महाराज’ के चमत्कारी चादर महोत्सव में शिरकत की। तीन दिवसीय इस भव्य आयोजन का उद्घाटन संघ प्रमुख के कर-कमलों द्वारा किया गया। यह महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के समागम और सामाजिक समरसता का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जिसमें देश भर से श्रद्धालु और गणमान्य नागरिक हिस्सा ले रहे हैं।
वैश्विक अशांति पर चिंता: क्यों नहीं थम रहे दुनिया में जारी युद्ध?
महोत्सव को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने वर्तमान समय में दुनिया के विभिन्न कोनों में चल रहे सैन्य संघर्षों और युद्धों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने रूस-यूक्रेन संकट और हालिया इजरायल-ईरान-अमेरिका संघर्ष का परोक्ष रूप से उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि आखिर ये युद्ध थम क्यों नहीं रहे हैं? भागवत ने स्पष्ट किया कि इन झगड़ों की जड़ में हमारी वैचारिक भिन्नता और ‘एकत्व’ की पहचान न होना है। उन्होंने कहा कि जब हम एक-दूसरे के साथ जुड़ाव महसूस नहीं करते, तब हम खुद को अलग समझने लगते हैं। यही अलगाववाद स्वार्थ को जन्म देता है, और जब व्यक्ति या राष्ट्र केवल अपने स्वार्थ को साधने में लग जाते हैं, तब संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।
करुणा का अभाव और सत्य से दूरी: अशांति का मूल कारण
अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने दादागुरु के संदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज चारों ओर की स्थिति अत्यंत विकट है। उन्होंने मार्मिक ढंग से कहा कि लोग अपने मन की करुणा को भूलते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज ‘सत्य’ के मार्ग से भटक गया है। हम बाहरी तौर पर भले ही अलग-अलग वेशभूषा, भाषा या राष्ट्र के दिखते हों, लेकिन आध्यात्मिक और तात्विक रूप से हम सब एक ही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक हम इस मूल एकता को नहीं पहचानेंगे, तब तक दुनिया से कलह और हिंसा को मिटाना संभव नहीं होगा।
लीग ऑफ नेशंस से यूएन तक: अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विफलता पर प्रहार
मोहन भागवत ने इतिहास का उदाहरण देते हुए शांति स्थापित करने वाली वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद ‘लीग ऑफ नेशंस’ की स्थापना की गई थी ताकि दोबारा ऐसा रक्तपात न हो, लेकिन वह असफल रही। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध हुआ और शांति के लिए ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (UN) बनाया गया। हालांकि, आज की वैश्विक परिस्थितियों और जारी युद्धों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि ये संस्थाएं भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाई हैं। उनके अनुसार, शांति केवल कागजी समझौतों या संस्थाओं से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और एकता के भाव से आएगी।
सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान: विशेष सिक्के और डाक टिकट का विमोचन
जैसलमेर में आयोजित इस तीन दिवसीय महोत्सव के दौरान भारतीय संस्कृति और दादागुरु के योगदान को चिरस्थायी बनाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। कार्यक्रम के दौरान दादागुरु और चादर महोत्सव की स्मृति में विशेष सिक्के और डाक टिकट जारी करने की योजना भी सामने आई है। इस पहल का उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत और संतों के चमत्कारी इतिहास से अवगत कराना है। मोहन भागवत का यह दौरा न केवल संघ के विचारों को स्पष्ट करता है, बल्कि भारतीय अध्यात्म के जरिए वैश्विक शांति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
















