Crude Oil Price: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिली है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड का भाव 3.7 प्रतिशत बढ़कर 109.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान इसकी कीमत 110 डॉलर के स्तर तक भी पहुंची, जो मई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है। वहीं, अमेरिकी कच्चे तेल WTI की कीमत में भी 3.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 101.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। तेल की कीमतों में इस उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ईंधन की कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
मिडिल ईस्ट में तनाव से सप्लाई प्रभावित होने की आशंका
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है। सऊदी अरब के ऊर्जा ठिकानों के आसपास हमलों की खबरों और होर्मुज जलडमरूमध्य के क्षेत्र में बढ़ती चिंताओं ने तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ाई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसी आशंका के कारण कारोबारियों की नजरें क्षेत्र के घटनाक्रम पर बनी हुई हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष ने भी बढ़ाई बाजार की चिंता
रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का असर भी ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की खबरों के कारण रूस से होने वाली आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। बाजार में यह चिंता है कि यदि ऊर्जा उत्पादन और परिवहन प्रभावित होते हैं, तो तेल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे हालात में खरीदार भविष्य की आपूर्ति को लेकर सतर्क हो जाते हैं, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
रूस से डीजल की सप्लाई को लेकर भी सवाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए रूस से डीजल की आपूर्ति का मुद्दा भी चर्चा में है। हालांकि, अमेरिका में इस संबंध में प्रस्तावित समझौते के विरोध में सांसदों द्वारा विधेयक पेश किए जाने की खबर है। इसके साथ ही रूस की रिफाइनरियों पर हमलों के कारण वहां से मिलने वाली आपूर्ति को लेकर भी सवाल बने हुए हैं। यदि सप्लाई जल्द सामान्य नहीं होती, तो डीजल सहित अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे व्यापार संतुलन, रुपये की विनिमय दर और महंगाई पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि देश में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। घरेलू ईंधन कीमतों पर तेल कंपनियों की लागत, रुपये-डॉलर विनिमय दर और सरकारी नीतियों का भी असर पड़ता है।
क्या भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?
फिलहाल घरेलू ईंधन कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, भू-राजनीतिक तनाव कम होने और तेल की आपूर्ति सुधरने पर कीमतों में राहत मिलने की संभावना भी रहेगी।
आगे किस दिशा में जाएंगे कच्चे तेल के दाम?
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों का रुख मुख्य रूप से मध्य पूर्व के हालात, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही और रूस से तेल की आपूर्ति पर निर्भर करेगा। यदि तनाव बढ़ता है, तो कीमतों में और उछाल संभव है। वहीं, हालात सामान्य होने पर बाजार में नरमी आ सकती है। भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अंतिम असर देखने के लिए अंतरराष्ट्रीय भाव के साथ घरेलू परिस्थितियों पर भी नजर रखनी होगी।
Read More : IND vs WI 5th T20I : भारत-वेस्टइंडीज पांचवां टी20 आज, भुवनेश्वर की वापसी, वैभव को मौका मिलेगा या नहीं?