Crime in Politics: मोकामा फिर चर्चा में है। चुनावी माहौल के बीच बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या ने पूरे इलाके को दहला दिया है। वहीं, अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया है। मोकामा का नाम सुनते ही अब उद्योगों की नहीं, बल्कि गोलियों की गूंज याद आती है। कभी यह धरती कारखानों के धुएं से महकती थी, लेकिन आज बारूद की गंध में डूबी है।
1980 के दशक में बिहार राजनीति अपनी भाषा सीख रहा था, वहीं मोकामा ने बुलेटों से अपनी सियासी जुबान लिखी। सत्ता की कुर्सी हो या जमीन की जिद, हर लड़ाई में बंदूकें बोलती थीं और बदले की आग में कई घर जलते रहे। अनंत सिंह, सूरजभान, सोनू-मोनू और टाल—चार नाम, चार चेहरे, लेकिन कहानी एक ही थी: डर, दौलत और दबदबा।
मोकामा की शुरुआत एक उद्योग नगरी के रूप में हुई थी। रेल इंजन की सीटी, कारखानों की चहल-पहल और गंगा किनारे टालों में हरियाली की छटा—यहाँ की सुबहें मेहनत और उम्मीद से जागती थीं। लेकिन वक्त के साथ धुआं अब बारूद में बदल गया। अपराध ने धीरे-धीरे इलाके की बागडोर संभाल ली। गंगा के टाल इलाके की जमीनें सिर्फ खेती के लिए नहीं, बल्कि वर्चस्व की जंग के मैदान बन गईं।
1961 में मोकामा के लदमा गांव में जन्मे अनंत सिंह ने गरीबी से नहीं बल्कि गोली से अपनी पहचान बनाई। भूमिहार समाज से आने वाले अनंत 1990 के दशक में राजनीति की सीढ़ी चढ़े और विधायक बने। कभी जेडीयू, कभी राजद—हर पार्टी में उनकी मौजूदगी रही, लेकिन पहचान हमेशा एक ही रही: डॉन। अपहरण और रंगदारी जैसे 30 से ज्यादा केस दर्ज रहे। 2019 में उनके घर से AK-47 बरामद होने पर उन्हें 10 साल की सजा हुई, लेकिन 2024 में वे बरी हो गए।
गंगा किनारे बसे टाल क्षेत्र में दशकों तक दुलारचंद यादव का नाम डर का पर्याय था। 1980 के दशक से ही वे इस इलाके के ‘अघोषित राजा’ बने रहे। जमीन कब्जा, रंगदारी और फायरिंग के मामलों में लिप्त, 76 वर्षीय दुलारचंद खुलेआम अनंत सिंह को ललकारते थे। 2025 के चुनाव में वे जनसुराज के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के लिए प्रचार कर रहे थे, लेकिन 30 अक्टूबर 2025 को गोलियों ने उनकी कहानी खत्म कर दी।
मोकामा में गैंगवार कोई नई बात नहीं। 1980 से अपराध और राजनीति एक-दूसरे के पूरक बन गए। अनंत सिंह और विवेका पहलवान की रंजिश, भूमिहार-राजपूत जातीय तनाव और जमीन की लालच ने हिंसा को हवा दी। दुलारचंद की हत्या ने पूरे इलाके में चुनावी माहौल को हिंसा के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
30 अक्टूबर की शाम घोसवारी में गोलियों की आवाज गूंजी और दुलारचंद यादव की हत्या हो गई। बताया जाता है कि अनंत सिंह के काफिले के पास वे मौजूद थे। FIR में अनंत सिंह और उनके समर्थकों के नाम दर्ज हैं। परिवार का आरोप है कि ‘छोटे सरकार ने ही दादा की हत्या कराई,’ जबकि अनंत का दावा है कि यह सूरजभान की साजिश थी।
सोमवार आधी रात दुलारचंद की हत्या के मामले में अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। अपनी पसंदीदा सफेद पैंट-शर्ट पहने अनंत को पुलिस पटना ले गई। उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है, और मोकामा के लिए भी यह कोई नई घटना नहीं। मोकामा की मिट्टी पर अनंत की कथा जारी है।
मोकामा की यह खूनी दास्तां दर्शाती है कि बिहार के कुछ हिस्सों में राजनीति और अपराध की जड़ें कितनी गहरी हैं। चुनावों के समय इलाके में हिंसा और डर की स्थिति आम हो जाती है। दुलारचंद की हत्या और अनंत सिंह की गिरफ्तारी यह सवाल फिर उठाती है कि क्या मोकामा में कभी खून की यह दास्तां खत्म होगी, या हर चुनाव के साथ इतिहास एक नई गोली लिखेगा।
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