Abujhmad Ops: नारायणपुर जिला पुलिस और आईटीबीपी (ITBP) के जवानों ने अबूझमाड़ के उस दुर्गम इलाके में एक बड़ी मनोवैज्ञानिक सफलता हासिल की है, जिसे नक्सली अपनी ‘अघोषित राजधानी’ कहते थे। कुतुल के पास स्थित ग्राम फरसगांव में सुरक्षाबलों ने नक्सलियों द्वारा बनाए गए एक विशालकाय स्मारक को जेसीबी मशीन चलाकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। यह कार्रवाई उस क्षेत्र में की गई है जो दशकों तक नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था और जहाँ कभी संगठन के शीर्ष नेताओं का जमावड़ा लगा रहता था। स्मारक का गिरना केवल एक कंक्रीट के ढांचे का अंत नहीं है, बल्कि उस दहशत के खात्मे का प्रतीक है जो नक्सलियों ने सालों से यहाँ फैला रखी थी।
‘माड़ बचाओ अभियान’ के तहत फरसगांव में पुलिस का वर्चस्व
नारायणपुर पुलिस द्वारा संचालित ‘माड़ बचाओ अभियान’ अब अपने निर्णायक चरण में पहुँच चुका है। 6 फरवरी 2026 को जिला पुलिस बल और आईटीबीपी की 41वीं वाहिनी की संयुक्त टीम एरिया डॉमिनेशन और सर्चिंग ऑपरेशन पर निकली थी। कोहकामेटा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम फरसगांव में नक्सलियों ने अपने मारे गए बड़े नेताओं की याद में एक विशाल स्मारक बना रखा था। यह स्मारक ग्रामीणों को डराने और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का एक जरिया था। सुरक्षाबलों ने ग्रामीणों की उपस्थिति में इस ढांचे को जमींदोज कर यह संदेश दिया कि अब अबूझमाड़ में केवल संविधान और कानून का शासन चलेगा।
मनोवैज्ञानिक युद्ध में पिछड़ता ‘लाल आतंक’
पुलिस अधिकारियों का मानना है कि नक्सली इन स्मारकों का उपयोग स्थानीय युवाओं को बरगलाने और हिंसा के रास्ते पर ले जाने के लिए करते थे। ये ढांचे नक्सलियों की झूठी विरासत को महिमामंडित करने का प्रयास थे। स्मारक ढहाने की इस कार्रवाई ने नक्सलियों के उस भ्रम को तोड़ दिया है कि वे सुरक्षित हैं। अब सुरक्षाबल उन सुदूर इलाकों में भी दाखिल हो चुके हैं जहाँ पिछले चार दशकों से प्रशासन की पहुंच शून्य थी। कुतुल और फरसगांव जैसे संवेदनशील गांवों में अब पुलिस कैंप स्थापित हो रहे हैं, जिससे ग्रामीणों का प्रशासन के प्रति विश्वास तेजी से बढ़ा है।
एक हाथ में बंदूक और दूसरे में विकास की नई नीति
बस्तर में नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। पुलिस की रणनीति अब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘विकास और सुरक्षा’ दोनों को साथ लेकर चल रही है। जिन रास्तों पर कभी नक्सलियों ने बारूदी सुरंगें (IED) बिछा रखी थीं, आज वहाँ पक्की सड़कें, पुल-पुलिया और मोबाइल टावर लगाए जा रहे हैं। अबूझमाड़ के बच्चों के लिए अब स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र खुल रहे हैं, जो शिक्षा के माध्यम से उनके भविष्य को उज्ज्वल बना रहे हैं। विकास की इस धारा ने नक्सलियों के पैर उखाड़ दिए हैं और वे जंगल के छोटे से हिस्से तक सिमट कर रह गए हैं।
‘नक्सल मुक्त बस्तर 2026’ के लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम
नारायणपुर पुलिस की यह हालिया कार्रवाई ‘नक्सल मुक्त बस्तर 2026’ के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है। नक्सलियों के गढ़ में घुसकर उनके प्रतीकों को मिटाना यह दर्शाता है कि सुरक्षाबलों का खुफिया तंत्र और जमीनी पकड़ अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। फरसगांव, जहाँ से कभी नक्सली अपनी समानांतर सरकार चलाते थे, आज शांति और प्रगति का गवाह बन रहा है। बस्तर अब हिंसा के काले साये से बाहर निकलकर मुख्यधारा की ओर निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।
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