African Swine Fever
African Swine Fever : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंतर्गत आने वाले सकालो स्थित शासकीय पिग फार्म में पशुपालन क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) जैसी घातक बीमारी पर लगाम लगाने के उद्देश्य से यहाँ वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल आधिकारिक तौर पर शुरू कर दिया गया है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज (NIHSAD), भोपाल द्वारा विकसित इस स्वदेशी टीके का परीक्षण बेहद कड़े मानकों के बीच किया जा रहा है। मंगलवार को भोपाल से विशेषज्ञों और वेटनरी डॉक्टरों की एक विशेष टीम अंबिकापुर पहुंची, जिन्होंने सूअरों को वैक्सीन की पहली खुराक देकर इस लंबी प्रक्रिया की शुरुआत की।
अफ्रीकन स्वाइन फीवर को सूअरों के लिए सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक माना जाता है। वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. सी.के. मिश्रा के अनुसार, इस बीमारी की मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक होती है, यानी संक्रमण होने पर पशु का बचना लगभग नामुमकिन होता है। यह वायरस घरेलू और जंगली दोनों ही प्रकार के सूअरों को अपना शिकार बनाता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि यह बीमारी ‘नॉन-ज़ूनोटिक’ है, जिसका अर्थ है कि यह सूअरों से इंसानों में नहीं फैलती। लेकिन आर्थिक दृष्टि से यह पशुपालकों की कमर तोड़ देती है क्योंकि एक भी पशु के संक्रमित होने पर पूरी खेप को मारना (किलिंग) अनिवार्य हो जाता है।
यह ट्रायल कोई अल्पकालिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसे पूरे एक वर्ष के लिए निर्धारित किया गया है। भोपाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश और डॉ. सेंथिल कुमार के नेतृत्व में इस टीके को तैयार किया गया है। ट्रायल के दौरान वैज्ञानिकों की टीम हर महीने सूअरों का ब्लड सैंपल लेगी और विभिन्न मानकों पर उनके स्वास्थ्य की जांच करेगी। इस दौरान यह देखा जाएगा कि वैक्सीन पशु के शरीर में कितनी एंटीबॉडी पैदा कर रही है और क्या इसका कोई दुष्प्रभाव तो नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ-साथ इस टीके का परीक्षण पंजाब और केरल जैसे राज्यों में भी किया जा रहा है, ताकि अलग-अलग जलवायु में इसके असर को समझा जा सके।
वर्तमान में अफ्रीकन स्वाइन फीवर का दुनिया भर में कोई भी व्यावसायिक या पूर्ण रूप से स्वीकृत (Commercial) टीका उपलब्ध नहीं है। भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक इस लाइलाज बीमारी का समाधान खोजने में जुटे हैं। अब तक संक्रमण फैलने पर केवल क्वारंटाइन और आवागमन पर प्रतिबंध लगाना ही एकमात्र रास्ता बचा था। यदि अंबिकापुर में चल रहा यह ट्रायल सफल रहता है, तो भारत दुनिया का वह पहला देश बन सकता है जिसने ASF के खिलाफ एक प्रभावी हथियार तैयार कर लिया है। यह पहल न केवल देश के पशुधन को सुरक्षित करेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय विज्ञान की धाक भी जमाएगी।
भारत में सूअर पालन एक बड़ा व्यवसाय है, जिससे लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। ASF आने पर पशुपालकों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि संक्रमित क्षेत्र के सभी पशुओं को नष्ट करना पड़ता है। डॉ. मिश्रा ने बताया कि विभागीय मार्गदर्शन में चल रहे इस ट्रायल से भविष्य में ठोस समाधान मिलने की पूरी उम्मीद है। यदि वैक्सीन सफल होती है, तो पशुपालकों को अब अपनी पूरी जमा-पूंजी खोने का डर नहीं रहेगा और इस क्षेत्र में निवेश भी बढ़ेगा।
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