AI Infrastructure : ChatGPT और Gemini के पीछे पानी की कितनी खपत? आंकड़े जानकर चौंक जाएंगे

ChatGPT और Gemini जैसे AI टूल हमारी जिंदगी आसान बना रहे हैं, लेकिन इनके पीछे पानी की खपत का सवाल तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। बेंगलुरु जैसे शहरों में डेटा सेंटरों की जरूरतें स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव डाल सकती हैं। आखिर इसका समाधान क्या है?

AI Infrastructure : ChatGPT, Gemini और Claude जैसे जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल दुनियाभर में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनका इस्तेमाल लेख लिखने, सवालों के जवाब पाने और तस्वीरें बनाने तक में किया जा रहा है। लेकिन इन सुविधाओं के पीछे बड़े डेटा सेंटर काम करते हैं, जहां शक्तिशाली चिप्स लगातार जटिल गणनाएं करती हैं। इससे भारी गर्मी पैदा होती है और उपकरणों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ सकती है। भारत में बढ़ते जल संकट के बीच AI की पानी खपत एक गंभीर मुद्दा बनती जा रही है।

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डेटा सेंटरों में कूलिंग के लिए क्यों चाहिए पानी?

डेटा सेंटरों में गर्मी कम करने के लिए कई जगह कूलिंग टावर इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें गर्म पानी वाष्पित होता है और अपने साथ गर्मी बाहर ले जाता है। इस प्रक्रिया में पानी का कुछ हिस्सा दोबारा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं रहता। लगातार चक्र चलने पर पानी में नमक और खनिजों की मात्रा बढ़ जाती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए कुछ पानी बाहर निकालना पड़ता है। इसलिए नए पानी की जरूरत बनी रहती है। पाइप और मशीनों को नुकसान से बचाने के लिए पानी का साफ होना जरूरी है, लेकिन हर स्थिति में पीने योग्य पानी इस्तेमाल करना आवश्यक नहीं है।

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भारत के जल संकट वाले शहरों पर बढ़ता दबाव

WRI India की मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आधे से अधिक डेटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां पहले से पानी की कमी का खतरा है। इनमें महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। बेंगलुरु इसका प्रमुख उदाहरण है। WELL Labs के अनुमान के मुताबिक, शहर के डेटा सेंटर प्रतिदिन करीब दो करोड़ लीटर पानी इस्तेमाल करते हैं। यह पानी उन्हीं भूजल स्रोतों से आ सकता है, जिन पर स्थानीय परिवार भी निर्भर हैं। ऐसे में डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या घरेलू जरूरतों और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकती है।

कुछ कंपनियां अपना रही हैं पानी बचाने वाली तकनीक

हालांकि, सभी डेटा सेंटर एक जैसी व्यवस्था पर निर्भर नहीं हैं। चेन्नई में ST Telemedia के केंद्रों में शून्य-निर्वहन व्यवस्था और उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग के उदाहरण दिए गए हैं। वहीं, हैदराबाद में Microsoft के डेटा सेंटर के लिए ऐसी यांत्रिक कूलिंग तकनीक का उल्लेख किया गया है, जिसमें शीतलन के लिए पानी की खपत बेहद कम या नगण्य हो सकती है। ये उदाहरण बताते हैं कि उचित तकनीक और योजना के जरिए पानी पर निर्भरता घटाई जा सकती है।

AI के एक सवाल में कितना पानी खर्च होता है?

Google के 2025 के अनुमान के अनुसार, Gemini पर एक सामान्य टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के लिए करीब 0.26 मिलीलीटर पानी खर्च होता है। OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन ने ChatGPT के एक सामान्य सवाल के लिए लगभग 0.32 मिलीलीटर पानी का आंकड़ा बताया था। दूसरी ओर, GPT-3 पर हुए एक अध्ययन में प्रति उत्तर 10 से 50 मिलीलीटर तक पानी की खपत का अनुमान लगाया गया। ये आंकड़े सीधे तुलनीय नहीं हैं, क्योंकि मॉडल, हार्डवेयर, स्थान और गणना के तरीके अलग-अलग होते हैं।

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AI विकास के साथ जरूरी हैं सख्त जल नियम

विशेषज्ञों के सामने चुनौती यह है कि पानी बचाने और बिजली की खपत नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाया जाए। जल संकट वाले शहरों में क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग, उपचारित सीवेज जल और पुनर्चक्रित औद्योगिक पानी को प्राथमिकता दी जा सकती है। सरकारों को डेटा सेंटरों की जल खपत सार्वजनिक करने, नए केंद्रों से पहले जल-जोखिम आकलन कराने और स्पष्ट नियम लागू करने पर विचार करना चाहिए। AI का विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए स्थानीय परिवारों, किसानों और पर्यावरण के पानी पर अनुचित दबाव नहीं पड़ना चाहिए।

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Chandan Das

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