Al Falah University
Al Falah University: फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति जवाद अहमद सिद्दीकी के महू स्थित पैतृक मकान के ‘अनधिकृत निर्माण’ को हटाने के लिए छावनी परिषद द्वारा जारी नोटिस के अमल पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश उस याचिका पर आया, जिसमें मकान पर मालिकाना हक का दावा करने वाले एक व्यक्ति ने अदालत से सुरक्षा की मांग की थी।
याचिकाकर्ता अब्दुल माजिद ने अदालत में दावा किया कि मकान उनके पिता हम्माद अहमद के निधन के बाद वर्ष 2021 में जवाद अहमद सिद्दीकी द्वारा ‘हिबा’ के तहत उन्हें सौंपा गया था। इस्लामी परंपरा के तहत संपत्ति को भेंट स्वरूप हस्तांतरित करने की प्रक्रिया को ‘हिबानामा’ कहा जाता है। माजिद ने बताया कि इसी हिबानामा के आधार पर वह इस मकान का वैध मालिक है।
इस मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य है कि दिल्ली के लाल किला के निकट 10 नवंबर को हुई धीमी गति वाली कार में विस्फोट की घटना में 15 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में अल-फलाह यूनिवर्सिटी की भूमिका को देखा जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार जवाद अहमद सिद्दीकी मूल रूप से महू निवासी हैं और उनके पिता हम्माद अहमद लंबे समय तक महू के शहर काजी रहे थे।
छावनी परिषद के रिकॉर्ड के अनुसार महू के मुकेरी मोहल्ले का मकान क्रमांक 1371 दिवंगत हम्माद अहमद के नाम पर दर्ज है। 19 नवंबर को जारी नोटिस में कहा गया था कि मकान का ‘अनधिकृत निर्माण’ तीन दिन के भीतर हटाया जाए, अन्यथा परिषद संबद्ध कानूनी प्रावधानों के तहत इसे ढहा सकती है और खर्च मकान के मालिक या वैध वारिसों से वसूल किया जाएगा।
अब्दुल माजिद (59) ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर नोटिस को चुनौती दी। माजिद ने कहा कि उन्हें सुनवाई का मौका दिए बिना नोटिस जारी किया गया। उनके वकील अजय बागड़िया ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
छावनी परिषद के वकील आशुतोष निमगांवकर ने दावा किया कि मकान पर पहले भी नोटिस जारी किए गए थे, जिनका कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने सुझाव दिया कि अब याचिकाकर्ता को जवाब दाखिल करने की मोहलत नहीं दी जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा ने दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि पहले नोटिस लगभग 30 साल पहले 1996-97 में जारी किए गए थे और अब नया नोटिस जारी किया गया है। इसलिए याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्त्ता 15 दिनों के भीतर सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ सक्षम प्राधिकारी के सामने जवाब दाखिल करें। सुनवाई के बाद ही मामले में तर्कपूर्ण आदेश जारी होगा। तब तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह याचिका के तथ्यों पर कोई निर्णय नहीं कर रही है।
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