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Rahul Gandhi Legal Victory: इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली राहुल गांधी को राहत, FIR दर्ज करने की याचिका खारिज

Rahul Gandhi Legal Victory: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट से कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज करने की मांग वाली एक जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की मांग आधारहीन है। इस फैसले के बाद राहुल गांधी पर चल रहा एक बड़ा कानूनी संकट फिलहाल टल गया है, जिससे कांग्रेस खेमे में खुशी की लहर है।

8 अप्रैल को सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया था फैसला

इस मामले में कानूनी प्रक्रिया काफी समय से चल रही थी। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सिमरन गुप्ता नाम की महिला द्वारा दायर की गई याचिका पर विस्तृत सुनवाई की थी। 8 अप्रैल 2026 को याचिकाकर्ता के वकील और राज्य सरकार के पक्ष को सुनने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने संभल की निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा और उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता को नकार दिया। कोर्ट का मानना था कि राजनीतिक बयानों को हमेशा देशद्रोह या अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

संभल की कोर्ट से शुरू हुआ था यह कानूनी विवाद

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के संभल जिले से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता सिमरन गुप्ता ने सबसे पहले संभल की स्थानीय अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ मामला दर्ज कराने की गुहार लगाई थी। हालांकि, वहां की कोर्ट ने 2025 में ही राहुल गांधी की कथित विवादास्पद टिप्पणी को अपराध मानने से इनकार करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने की मांग खारिज कर दी थी। इसी फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की दलीलों को पर्याप्त नहीं माना।

क्या था राहुल गांधी का वह कथित बयान?

विवाद की जड़ 15 जनवरी 2025 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कार्यालय के उद्घाटन के दौरान दिया गया राहुल गांधी का एक भाषण है। याचिकाकर्ता के अनुसार, राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा था, “हम भाजपा, आरएसएस और भारत सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।” याचिकाकर्ता का दावा था कि भारत सरकार के खिलाफ लड़ने की बात कहना सीधे तौर पर देशद्रोह के समान है और इससे देश को अस्थिर करने की साजिश की बू आती है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि इस टिप्पणी से देश के करोड़ों नागरिकों की भावनाएं आहत हुई हैं और यह सार्वजनिक शांति के लिए खतरा है।

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम देशद्रोह का तर्क

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजनीतिक विरोध और देश के प्रति निष्ठा के बीच के बारीक अंतर को समझा। याचिकाकर्ता ने जहां इसे जानबूझकर की गई एक राष्ट्रविरोधी टिप्पणी बताया, वहीं कानूनी विशेषज्ञों का मानना था कि एक विपक्षी नेता के रूप में सरकार की नीतियों का विरोध करना संवैधानिक दायरे में आता है। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अंततः सिमरन गुप्ता की याचिका को खारिज कर राहुल गांधी को क्लीन चिट दे दी। इस निर्णय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक आलोचना के अधिकार की जीत के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल, इस आदेश के बाद अब राहुल गांधी के खिलाफ इस विशेष मामले में कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

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