America-Iran War
America-Iran War: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग अब अपने दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर रही है। इस दौरान युद्ध के मैदान से कहीं ज्यादा खतरनाक बयानबाजी राजनीतिक गलियारों में देखने को मिल रही है। हाल के दिनों में अमेरिका और इजरायल के कई शीर्ष नेताओं ने इस संघर्ष को अचानक ‘धार्मिक मोड़’ देना शुरू कर दिया है। इसे ‘सिग्नल फायर’ की जंग बताया जा रहा है, जिसका सीधा संबंध ईसाइयत की उस मान्यता से है जिसमें जीसस क्राइस्ट के पुनर्जन्म (Second Coming) की बात कही गई है। चर्चा यहां तक है कि डोनाल्ड ट्रंप को इस ‘अंत समय’ (End Times) की घटनाओं को शुरू करने के लिए ‘ईश्वर का दूत’ माना जा रहा है।
सैन्य धार्मिक स्वतंत्रता फाउंडेशन (MRFF) नामक संस्था ने एक चौंकाने वाला दावा किया है। संस्था के अनुसार, उन्हें कई अमेरिकी सैनिकों की शिकायतें मिली हैं कि उनके वरिष्ठ अधिकारी इस युद्ध को बाइबिल में वर्णित “अंतिम युद्ध” यानी ‘आर्मगेडन’ (Armageddon) के रूप में पेश कर रहे हैं।
एक गुमनाम सैनिक ने बताया कि कमांडर्स द्वारा सैनिकों को यह समझाया जा रहा है कि यह सब ईश्वर की एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है। इसके लिए ‘बुक ऑफ रिवीलेशन’ (Book of Revelation) के उद्धरण दिए जा रहे हैं, ताकि सैनिकों को यह विश्वास दिलाया जा सके कि वे किसी राजनीतिक कारण से नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन के लिए लड़ रहे हैं।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इस युद्ध को धार्मिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने ईरान की तुलना यहूदी परंपरा के प्राचीन दुश्मन ‘अमालेक’ से की है। तोराह के अनुसार, अमालेक बुराई का प्रतीक है जिसे जड़ से खत्म करना अनिवार्य माना गया है। वहीं, इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि अगर इजरायल पूरे मध्य पूर्व पर नियंत्रण कर ले तो यह गलत नहीं होगा, क्योंकि बाइबिल में इस भूमि का वादा (Promised Land) किया गया है।
अमेरिकी-इस्लामिक संबंध परिषद (CAIR) ने इस तरह की भाषा की कड़ी निंदा की है। उनका तर्क है कि युद्ध को ‘पवित्र’ बताना मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा दे सकता है। इतिहास गवाह है कि 2001 में जॉर्ज बुश ने भी आतंकवाद के खिलाफ जंग को ‘क्रूसेड’ कहा था, जिसे बाद में वापस लेना पड़ा। वर्तमान में विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ द्वारा ईरान को ‘धार्मिक कट्टरपंथी’ कहना इसी पुरानी विचारधारा का हिस्सा प्रतीत होता है, जो संघर्ष को ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की लड़ाई में तब्दील कर देता है।
डरहम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोलियन मिशेल और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के इब्राहिम अल-अबू-शरीफ के अनुसार, नेता अक्सर तीन उद्देश्यों के लिए धर्म का सहारा लेते हैं: जनता को एकजुट करने के लिए, ‘हम बनाम वे’ की भावना पैदा करने के लिए और युद्ध को नैतिक रूप से सही साबित करने के लिए। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जब किसी राजनीतिक संघर्ष को ‘ईश्वर की इच्छा’ मान लिया जाता है, तो समझौते की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जब लोग मानते हैं कि वे ईश्वर के लिए लड़ रहे हैं, तो शांति वार्ता करना लगभग असंभव हो जाता है।
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