Assembly Elections 2026
Assembly Elections 2026 : देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है और प्रचार अपनी पूरी तीव्रता पर है। हालांकि, इस बार का चुनावी परिदृश्य पिछले वर्षों से काफी अलग नजर आ रहा है। राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों से लेकर रैलियों के भाषणों तक, विकास के पारंपरिक मुद्दे जैसे सड़क, बिजली और पानी कहीं पीछे छूट गए हैं। उनकी जगह अब भावनात्मक मुद्दों, धार्मिक पहचान और स्थानीय अस्मिता (Regional Pride) ने ले ली है। असम से लेकर पश्चिम बंगाल और दक्षिण में केरल से तमिलनाडु तक, हर जगह राजनीतिक दल जनता की भावनाओं को सहलाकर वोट बटोरने की जुगत में लगे हैं। अब मुकाबला इस बात पर है कि जनता विकास के दावों पर भरोसा करती है या अपनी संस्कृति और पहचान के नाम पर वोट देती है।
पश्चिम बंगाल में चुनावी जंग इस बार ‘काम बनाम पहचान’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है। ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासन का लेखा-जोखा मुख्य मंच से गायब होकर बैकस्टेज चला गया है। भारतीय जनता पार्टी की चुनावी स्क्रिप्ट पूरी तरह से बहुसंख्यक मतदाताओं को एकजुट करने पर केंद्रित है। यही कारण है कि भाजपा के भाषणों में रोजगार से ज्यादा घुसपैठ की चर्चा है और सड़क से ज्यादा सीमा सुरक्षा का जिक्र हो रहा है। भाजपा जहां डेमोग्राफिक बदलाव को बंगाल की अस्मिता के लिए खतरा बता रही है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे बंगाल की संस्कृति, खान-पान और भाषा पर बाहरी हमला करार दे रही हैं। ‘मछली और अंडा’ जैसे आहार संबंधी मुद्दों को उठाकर क्षेत्रीय गौरव को जगाने की कोशिश की जा रही है।
असम में चुनावी लड़ाई पहचान की राजनीति के सबसे जटिल दौर में पहुंच गई है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ‘असमिया अस्मिता’ को बचाने के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) और घुसपैठियों को बाहर निकालने के मुद्दे को ढाल बना रहे हैं। वे लगातार डेमोग्राफिक बदलाव का मुद्दा उठाकर यह संदेश दे रहे हैं कि अगर बाहरी लोगों को नहीं रोका गया, तो मूल असमिया संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी भाजपा के इन तीखे तेवरों को राज्य की मिली-जुली संस्कृति और भाषाई सद्भाव पर प्रहार बता रही है। यहां चुनाव धर्म से आगे बढ़कर भाषा और नागरिकता के भावनात्मक गलियारों में जा फंसा है।
दक्षिण के राज्यों में भी कहानी बहुत अलग नहीं है। तमिलनाडु में मुकाबला स्पष्ट रूप से ‘हिंदुत्व बनाम द्रविड़ अस्मिता’ के बीच है। डीएमके (DMK) जहां तमिल भाषा और प्राचीन संस्कृति को केंद्र में रखकर केंद्र के हस्तक्षेप के खिलाफ नैरेटिव बना रही है, वहीं भाजपा हिंदुत्व के बड़े दायरे में राज्य को लाने का प्रयास कर रही है। केरल में भी सॉफ्ट हिंदुत्व और धार्मिक मुद्दों की गूंज सुनाई दे रही है। सबरीमाला मंदिर में कथित सोना चोरी का मुद्दा राजनीतिक हथियार बन गया है, जिसे भाजपा, कांग्रेस और लेफ्ट—तीनों दल अपनी सुविधानुसार उठा रहे हैं। यहां भी विकास की चर्चा के बजाय संस्कृति और परंपराओं की रक्षा मुख्य मुद्दा बनी हुई है।
राज्यों की भौगोलिक सीमाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीतियां एक जैसी नजर आ रही हैं। पहचान और अस्मिता का यह ‘फुल पैकेज’ जनता को कितना लुभा पाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या मतदाता सड़क और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों को भूलकर केवल भावनात्मक अपील पर मुहर लगाएंगे? यह यक्ष प्रश्न फिलहाल हवा में तैर रहा है। अस्मिता की इस राजनीति ने चुनाव को बेहद रोमांचक और ध्रुवीकृत बना दिया है। इसका अंतिम फैसला 4 मई को आने वाले चुनावी परिणामों से ही होगा, जो यह तय करेंगे कि भारतीय राजनीति में अब भावनाओं का वजन विकास के काम से अधिक हो गया है या नहीं।
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