Atal Bihari Vajpayee
Atal Bihari Vajpayee 101st Birth Anniversary: आज पूरा देश भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती मना रहा है। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता, कवि और उदारवादी विचारधारा के संवाहक थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके धुर विरोधी और आलोचक भी उनकी शालीनता और तर्कपूर्ण संवाद शैली के मुरीद थे। अटल जी ने भारतीय लोकतंत्र में मर्यादाओं का एक ऐसा मानक स्थापित किया, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। उनकी वाकपटुता का जादू कुछ ऐसा था कि सदन में जब वे खड़े होते थे, तो पूरा हॉल शांति से उन्हें सुनने को मजबूर हो जाता था।
अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिभा को पहचानने वालों में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम सबसे ऊपर आता है। साल 1957 में जब अटल जी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर सदन पहुंचे, तो उनकी ओजस्वी वाणी ने नेहरू को गहराई से प्रभावित किया। एक बार नेहरू ने अटल जी का भाषण सुनने के बाद उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि “यह लड़का एक दिन बहुत आगे जाएगा।” इतना ही नहीं, एक विदेशी राजनयिक से अटल जी का परिचय कराते हुए नेहरू ने गर्व से कहा था, “इनसे मिलिए, यह भविष्य में भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे।” नेहरू की यह भविष्यवाणी दशकों बाद बिल्कुल सच साबित हुई।
अटल जी अपनी शुद्ध और प्रभावी हिंदी के लिए जाने जाते थे। वे अक्सर सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करते थे, लेकिन उनके शब्दों में कड़वाहट के बजाय रचनात्मकता होती थी। पंडित नेहरू अक्सर अटल जी के हमलों का जवाब मुस्कुराकर देते थे। वाजपेयी जी ने एक बार स्वयं एक दिलचस्प किस्सा साझा किया था। उन्होंने सदन में पंडित नेहरू के व्यक्तित्व पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “आपमें चर्चिल और चैंबरलेन दोनों के गुण समाहित हैं।” इतनी बड़ी टिप्पणी के बावजूद नेहरू नाराज नहीं हुए। उसी शाम एक कार्यक्रम में जब दोनों का आमना-सामना हुआ, तो नेहरू ने सहजता से कहा, “आज तुमने वाकई बहुत अच्छा और प्रभावी भाषण दिया।”
भले ही नेहरू और अटल जी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन दोनों के बीच एक अनूठा बौद्धिक रिश्ता था। जब पंडित नेहरू का निधन हुआ, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें जो श्रद्धांजलि दी, वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अमर हो गई। उन्होंने नेहरू की नीतियों और उनके लोकतांत्रिक मूल्यों की जमकर प्रशंसा की। अटल जी ने भावुक होते हुए कहा था, “एक महान नेता चला गया है, अब उनके अनुयायियों की परीक्षा का वक्त है। सूरज डूब चुका है, अब हमें सितारों की मंद रोशनी में ही अपना रास्ता ढूंढना होगा।” उनके ये शब्द बताते हैं कि उस दौर की राजनीति में विरोध के बीच भी कितना सम्मान शेष था।
अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती को ‘सुशासन दिवस’ (Good Governance Day) के रूप में भी मनाया जाता है। नेहरू के प्रति उनका सम्मान और नेहरू का उनके प्रति भरोसा यह सिखाता है कि लोकतंत्र में संवाद के रास्ते कभी बंद नहीं होने चाहिए। आज के दौर में, जब राजनीतिक विमर्श में कड़वाहट बढ़ रही है, अटल-नेह्ररु का यह किस्सा एक नई रोशनी दिखाता है। अटल जी की कविताएं, उनकी विदेश नीति और पोखरण परमाणु परीक्षण जैसे साहसी फैसले उन्हें सदा के लिए अमर बना गए हैं। उनके आदर्श आज भी देश के युवाओं और राजनेताओं के लिए एक ध्रुव तारे के समान मार्गदर्शक हैं।
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