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Bangladesh Crisis: चिन्मय कृष्ण दास समेत 39 लोगों पर हत्या का आरोप तय, क्या कानूनी प्रक्रिया में बरती जा रही निष्पक्षता?

Bangladesh Crisis: बांग्लादेश के चटगांव की एक अदालत ने वकील सैफुल इस्लाम अलिफ की हत्या के मामले में इस्कॉन (ISKCON) के पूर्व नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु और अन्य 22 लोगों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय कर दिए हैं। यह मामला मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति और धार्मिक तनाव को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ले आया है। सोमवार सुबह कड़ी सुरक्षा के बीच आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहाँ चटगांव ट्रायल ट्रिब्यूनल के जज मोहम्मद जाहिदुल हक ने उन पर हत्या और साजिश की धाराओं के तहत मुकदमे की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया।

जेल में होने के बावजूद हत्या का आरोप: क्या यह केवल राजनीतिक प्रतिशोध है?

इस पूरे मामले में सबसे विवादित पहलू यह है कि जिस दिन वकील सैफुल इस्लाम की हत्या हुई, उस समय चिन्मय कृष्ण दास पहले से ही जेल में बंद थे। उनकी गिरफ्तारी और बिना शर्त रिहाई की मांग को लेकर ही चटगांव में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। समर्थकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जेल में मौजूद व्यक्ति पर हत्या का मुकदमा चलाना न केवल तर्कहीन है, बल्कि यह उन्हें फंसाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा भी हो सकता है। आरोपपत्र में उन्हें धारा 302 (हत्या) और 109 (उकसाने या साजिश) के तहत आरोपी बनाया गया है, जिसे कई लोग ‘इंसाफ के नाम पर मजाक’ करार दे रहे हैं।

26 नवंबर की वो खूनी हिंसा: वकील सैफुल इस्लाम की मौत और दर्ज मुकदमे

यह पूरा विवाद 26 नवंबर 2024 को शुरू हुआ था, जब ‘सनातनी जागरण जोते’ के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी। कोर्ट के बाहर हजारों की संख्या में उनके समर्थक जुटे थे। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। आरोप है कि इसी अफरा-तफरी के बीच वकील सैफुल इस्लाम अलिफ की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद सैफुल के पिता जमालुद्दीन ने 31 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके अतिरिक्त, पुलिस पर हमले, सार्वजनिक काम में बाधा डालने और बम (कॉकटेल) फोड़ने के आरोप में पांच और अलग मुकदमे दर्ज किए गए थे।

पद्मा से लेकर बंगाल तक आक्रोश: चिन्मय प्रभु की रिहाई के लिए उठती आवाजें

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद बांग्लादेश के भीतर ही नहीं, बल्कि भारत के पश्चिम बंगाल में भी विरोध की लहर देखी गई। बांग्लादेश में पद्मा नदी के किनारों पर हजारों लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर और शांतिपूर्ण मार्च निकालकर उनकी रिहाई की मांग की थी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे केवल अपने धार्मिक अधिकारों और सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें दबाने के लिए आपराधिक मामलों का सहारा ले रही है। अब जैसे-जैसे कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, सीमा के दोनों ओर तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

फरार आरोपी और भविष्य की कानूनी राह: सुरक्षा के कड़े इंतजाम

अदालती सूत्रों के अनुसार, इस हाई-प्रोफाइल मामले में कुल 39 आरोपी बनाए गए हैं। इनमें से 23 वर्तमान में पुलिस हिरासत में हैं, जबकि 16 अन्य अभी भी फरार बताए जा रहे हैं। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत परिसर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था ताकि किसी भी संभावित झड़प या प्रदर्शन को रोका जा सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठन इस मामले पर करीब से नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह मुकदमा बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्यायपालिका की कसौटी माना जा रहा है।

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