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Bangladesh Crisis: बांग्लादेश में राजनीतिक घमासान, राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन के इस्तीफे की मांग पर मतभेद

Bangladesh Crisis: बांग्लादेश में आगामी चुनाव से पहले ही राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रमुख विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट के बीच गहरे मतभेद उभर आए हैं। इस बीच, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बिगड़ती सेहत ने राजनीतिक माहौल को और भी अधिक नाजुक बना दिया है, क्योंकि उन्हें लगातार खराब स्वास्थ्य के चलते वेंटीलेटर पर रखा गया है।

अंतरिम सरकार ने राष्ट्रपति के मुद्दे पर अभी तक कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है, लेकिन सूत्रों से संकेत मिले हैं कि राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन स्वयं चुनाव के बाद पद छोड़ने को तैयार हैं। यह पूरा विवाद ऐसे समय में चल रहा है जब देश एक बड़े राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

बीएनपी ने किया छात्र आंदोलन की मांग का कड़ा विरोध

बीएनपी ने राष्ट्रपति के पद को खाली करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया है। मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के साथ बैठक के बाद, बीएनपी स्टैंडिंग कमिटी सदस्य नजूरुल इस्लाम खान ने स्पष्ट किया कि इस समय राष्ट्रपति पद खाली होने से देश “संवैधानिक शून्य” और “राज्य संकट” में फँस जाएगा, जो राष्ट्रहित के विरुद्ध होगा।

उन्होंने चेतावनी दी, “पतनशील तानाशाह के चाटुकार यदि कोई संवैधानिक या राजनीतिक संकट पैदा करने की कोशिश करेंगे, तो प्रजातांत्रिक राजनीतिक दल और विभिन्न संगठन मिलकर इसका सामना करेंगे।” बीएनपी के अन्य वरिष्ठ सदस्यों, अमीर खासरू महमूद और सलाहुद्दीन अहमद ने भी इसी रुख को दोहराया और कहा कि राष्ट्रपति पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है, और इस्तीफे या हटाने से गंभीर राष्ट्रीय संकट पैदा हो सकता है। बीएनपी ने सभी पक्षों से नया संकट न पैदा करने की अपील की।

Bangladesh Crisis: छात्र आंदोलन की मांग: ‘1972 के संविधान को खत्म करो, राष्ट्रपति को हटाओ’

दूसरी ओर, एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट और जातीय नागरिक कमिटी अपनी मांगों पर अडिग हैं। उन्होंने बुधवार शाम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 1972 के संविधान को रद्द करने और राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन को तुरंत हटाने की मांग दोहराई।

मूवमेंट के कन्वेनर हसनत अब्दुल्लाह ने आवामी लीग, छात्र लीग और जातीय पार्टी को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों से राष्ट्रीय एकता में शामिल होने का आह्वान किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कोई दल उनकी ‘1972 संविधान रद्द करने और राष्ट्रपति के इस्तीफे’ की मांग में उनसे नहीं जुड़ता है, तो वे उसका बहिष्कार करेंगे। अब्दुल्लाह ने तर्क दिया कि यह संविधान राजनीतिक संकट को लंबा खींचता है और देश में फासीवादी ढांचे को मजबूत करता रहा है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के ‘संवैधानिक निरंतरता’ के तर्क का भी हवाला दिया, जिसका उपयोग वह केयरटेकर सरकार की चर्चाओं के दौरान करती थीं।

Bangladesh Crisis: अंतरिम सरकार का रुख: राजनीतिक सहमति से होगा फैसला

अंतरिम सरकार के सूचना सलाहकार नहिद इस्लाम ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति पर कोई भी फैसला कानूनी या संवैधानिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति और राष्ट्रीय एकता से लिया जाएगा।

उन्होंने कहा, “इंटरिम गवर्नमेंट सभी हितधारकों से परामर्श कर रही है… राष्ट्रपति का पद रहना या न रहना अब कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक है।” सरकार स्थिरता, सुरक्षा और अनुशासन को प्राथमिकता दे रही है। नहिद इस्लाम ने प्रदर्शनकारियों से धरना न देने की अपील की, क्योंकि उनका संदेश सरकार तक पहुँच चुका है। मुख्य सलाहकार के प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम ने पुष्टि की कि राष्ट्रपति को हटाने पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

विवाद की शुरुआत और राष्ट्रपति का इस्तीफा देने का संकेत

इस पूरे विवाद की शुरुआत रविवार को एक पत्रिका में छपी राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन की उस टिप्पणी से हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें शेख हसीना का इस्तीफा मिलने की खबर तो सुनाई दी थी, लेकिन उन्हें कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिला। इस पर सोमवार को विधि सलाहकार आसिफ नजूरुल ने राष्ट्रपति पर झूठ बोलने और उनकी मानसिक क्षमता पर सवाल उठाया, जिसके बाद छात्र संगठनों ने इस्तीफे की मांग तेज कर दी।

इस बीच, एक विदेशी एजेंसी को दिए इंटरव्यू में राष्ट्रपति शाहाबुद्दीन ने खुद यह संकेत दिया है कि वह फरवरी चुनाव के बाद पद छोड़ने को तैयार हैं। उन्होंने यूनुस सरकार द्वारा “अपमानित” महसूस करने का हवाला दिया, जिसमें सात महीनों से कोई मुलाकात न होना और दूतावासों से उनकी तस्वीरें हटाना शामिल है। उन्होंने कहा, “मैं जाना चाहता हूँ… लेकिन चुनाव तक बने रहूँगा।”

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