Bangladesh Election 2026
Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आगामी राष्ट्रीय संसदीय चुनावों ने दक्षिण एशियाई राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इस बार के चुनावों की सबसे बड़ी विशेषता अल्पसंख्यकों की अभूतपूर्व और रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी है। चुनाव आयोग द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस बार कुल 80 अल्पसंख्यक उम्मीदवार अपनी किस्मत आज़माने के लिए चुनावी रण में उतरे हैं। अगस्त में शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग के पतन और सत्ता परिवर्तन के बाद यह देश का पहला बड़ा चुनाव है, जिसे नए बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस बार के चुनावी मुकाबले में विविधता का एक नया रंग देखने को मिल रहा है। कुल 80 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों में से 68 को 22 विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया है, जबकि 12 उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहे हैं। महिला सशक्तिकरण की दृष्टि से भी यह चुनाव खास है क्योंकि 10 अल्पसंख्यक महिलाएं इस बार संसद पहुँचने के लिए अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रही हैं। आवामी लीग की अनुपस्थिति ने मैदान को पूरी तरह खोल दिया है, जिससे बीएनपी (BNP) और अन्य दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन गई है।
बांग्लादेश की राजनीति में इस बार का सबसे बड़ा ‘सरप्राइज’ कट्टरपंथी मानी जाने वाली पार्टी जमात-ए-इस्लामी की ओर से आया है। जमात ने अपने इतिहास में पहली बार किसी हिंदू चेहरे को टिकट देकर सबको चौंका दिया है। पार्टी ने खुलना-1 सीट से हिंदू व्यवसायी कृष्णा नंदी को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। कृष्णा नंदी 2003 से जमात से जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदू बहुल क्षेत्र से नंदी को उतारना अपनी कट्टरपंथी छवि को उदार बनाने और वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता पाने की जमात की एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है।
गोपालगंज-3 सीट इस समय चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जहाँ हिंदू महाजोत के महासचिव गोबिंद चंद्र प्रमाणिक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। रोचक बात यह है कि शुरुआत में चुनाव आयोग ने तकनीकी आधार पर उनकी नामांकन पर्ची खारिज कर दी थी, लेकिन कानूनी अपील के बाद उनकी उम्मीदवारी बहाल कर दी गई। प्रमाणिक की सक्रियता ने इस सीट पर पारंपरिक दलों के गणित को उलझा दिया है। यह दर्शाता है कि बांग्लादेशी मतदाता अब स्थापित दलों के बजाय स्वतंत्र और प्रभावशाली स्थानीय चेहरों की ओर भी देख रहे हैं।
उम्मीदवारों के विश्लेषण से पता चलता है कि बांग्लादेश कम्युनिस्ट पार्टी ने सबसे अधिक उदारता दिखाते हुए 17 अल्पसंख्यक चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा है। वहीं, मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 6 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया है। कुल 60 पंजीकृत दलों में से कई छोटे दल भी इस बार अल्पसंख्यकों के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। आवामी लीग के निलंबन के बाद यह स्पष्ट है कि अब अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण किसी एक पार्टी की ओर न होकर कई दिशाओं में बंटने वाला है।
शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग, जो पारंपरिक रूप से अल्पसंख्यकों की रक्षक मानी जाती थी, इस बार पूरी तरह चुनावी प्रक्रिया से बाहर है। विशेषज्ञों का मानना है कि आवामी लीग के बिना हो रहे ये चुनाव अल्पसंख्यक नेतृत्व के लिए एक अग्निपरीक्षा की तरह हैं। चुनाव आयोग ने मतदान के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं ताकि बिना किसी डर और भेदभाव के लोग वोट डाल सकें। 12 फरवरी के नतीजे न केवल नई सरकार तय करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि बांग्लादेश का सामाजिक और लोकतांत्रिक ढांचा भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
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