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Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश की राजनीति में नई हलचल,छात्र संगठन और जमात-ए-इस्लामी के बीच बड़ा चुनावी गठबंधन

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश की सत्ता संरचना में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। शेख हसीना के पतन के बाद अस्तित्व में आई नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) ने कट्टरपंथी झुकाव वाली जमात-ए-इस्लामी और आठ अन्य दलों के साथ चुनावी हाथ मिला लिया है। इस गठबंधन में कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) भी एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में शामिल हुई है। रविवार को ढाका में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने इस रणनीतिक गठबंधन की औपचारिक घोषणा की। यह नया गठजोड़ सीधे तौर पर खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करने वाला है।

Bangladesh Election 2026: 300 सीटों पर चुनाव लड़ने का लक्ष्य और जमात का काला इतिहास

शफीकुर रहमान ने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन आगामी आम चुनावों में सभी 300 संसदीय सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। उन्होंने इसे केवल एक चुनावी समझौता न मानकर ‘राष्ट्र निर्माण’ का मिशन करार दिया। हालांकि, जमात-ए-इस्लामी का इस गठबंधन में होना कई सवाल खड़े कर रहा है। जमात वही दल है जिसने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था और पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर नरसंहार और अत्याचारों में भूमिका निभाई थी। युद्ध अपराधों के कारण इसके कई शीर्ष नेताओं को पहले ही फांसी की सजा दी जा चुकी है। अब छात्रों द्वारा बनाई गई पार्टी का ऐसे दल के साथ जाना बांग्लादेशी राजनीति में चर्चा का विषय है।

Bangladesh Election 2026: गठबंधन में दरार: एनसीपी नेताओं का सामूहिक इस्तीफा और विरोध

इस अपवित्र माने जा रहे गठबंधन के कारण नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) के भीतर विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई है। छात्र राजनीति से उभरे कई नेताओं ने इस फैसले पर गहरी नाराजगी जताई है। करीब 30 प्रमुख नेताओं ने एक संयुक्त विरोध पत्र जारी किया है, जबकि दो वरिष्ठ महिला पदाधिकारियों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इन बागी नेताओं का तर्क है कि जिस जमात ने 1971 के मुक्ति संग्राम की भावनाओं का अपमान किया, उसके साथ समझौता करना एनसीपी के लोकतांत्रिक मूल्यों और विचारधारा के साथ विश्वासघात है।

क्यों मजबूर हुई नाहिद इस्लाम की एनसीपी?

महज 27 वर्षीय नाहिद इस्लाम, जो कभी हसीना विरोधी आंदोलन के नायक थे, अब अपनी नई पार्टी को संगठित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नाहिद ने स्वीकार किया है कि उनके पास चुनाव लड़ने के लिए न तो पर्याप्त धन है और न ही मजबूत जमीनी नेटवर्क। एनसीपी के कार्यकर्ता क्राउडफंडिंग और अपनी निजी सैलरी से चुनाव प्रचार का खर्च उठा रहे हैं। संसाधनों की इसी कमी और संगठन की कमजोरी ने छात्रों को पुराने और स्थापित दलों के साथ गठबंधन करने पर मजबूर किया है। एनसीपी का वादा भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से मुक्ति दिलाना है, लेकिन बिना किसी मजबूत आधार के यह राह कठिन नजर आती है।

सर्वे और पोल में पिछड़ी एनसीपी, जमात का बढ़ता प्रभाव

हाल ही में आए ओपिनियन पोल के नतीजे एनसीपी के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं। दिसंबर के सर्वे के अनुसार, पूर्व पीएम खालिदा जिया की पार्टी BNP 30% समर्थन के साथ शीर्ष पर है, जबकि जमात-ए-इस्लामी 26% के साथ दूसरे स्थान पर मजबूती से खड़ी है। इसके विपरीत, एनसीपी को केवल 6% समर्थन मिलता दिख रहा है। ढाका विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में मिली करारी हार ने भी यह साबित कर दिया है कि आंदोलन की लोकप्रियता को वोटों में बदलना आसान नहीं है। अब फरवरी में होने वाले आम चुनाव यह तय करेंगे कि यह नया गठबंधन बांग्लादेश का भविष्य बदलेगा या खुद इतिहास बन जाएगा।

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