Basilisk Lizard
Basilisk Lizard: सदियों से इंसान की यह तमन्ना रही है कि वह बिना किसी सहारे के पानी की सतह पर दौड़ सके। इसके लिए कई तकनीकें और जुगाड़ आजमाए गए—किसी ने जूते के नीचे फ्लोट्स लगाए तो किसी ने तेज रफ्तार नाव का सहारा लिया, लेकिन गुरुत्वाकर्षण और पानी के घनत्व के आगे इंसान हमेशा हार गया। दुनिया के अधिकांश जीव या तो पानी में तैरते हैं या फिर डूब जाते हैं। लेकिन प्रकृति की गोद में एक ऐसा अद्भुत प्राणी है जिसने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया है। हम बात कर रहे हैं बेसिलिस्क छिपकली (Basilisk Lizard) की, जो पानी पर इतनी तेजी से दौड़ती है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं।
बेसिलिस्क छिपकली को दुनिया भर में ‘जीसस क्राइस्ट लिजर्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम इसे इसकी पानी पर चलने की जादुई क्षमता के कारण मिला है। मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्षावनों में पाई जाने वाली यह छिपकली अपनी जान बचाने के लिए पानी का सहारा लेती है। जब भी कोई शिकारी इसके पीछे पड़ता है, यह जमीन छोड़कर सीधे तालाब या नदी की सतह पर दौड़ने लगती है। इसकी यह खूबी इसे अन्य सरीसृपों से बिल्कुल अलग और खास बनाती है।
बेसिलिस्क छिपकली की इस अद्भुत शक्ति के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि शुद्ध विज्ञान और उसके शरीर की बनावट है। इसके पिछले पैरों की उंगलियां काफी लंबी होती हैं और उनके किनारों पर त्वचा की विशेष झालरें या फ्रिंज (Fringes) होते हैं। जब यह छिपकली जमीन पर चलती है, तो ये झालरें सिमटी रहती हैं, लेकिन जैसे ही यह पानी पर कदम रखती है, ये पंख की तरह फैल जाती हैं। यह बनावट पानी की सतह पर छोटे-छोटे ‘एयर पॉकेट्स’ (Air Pockets) बनाती है, जो छिपकली के वजन को संभालने और उसे डूबने से बचाने के लिए कुशन का काम करते हैं।
बेसिलिस्क का पानी पर दौड़ना एक जटिल भौतिक प्रक्रिया है, जो तीन चरणों में पूरी होती है:
स्लैप (Slap): छिपकली अपने पैरों को बहुत जोर से पानी की सतह पर पटकती है। इससे पानी के नीचे हवा का एक बुलबुला (Air Pocket) बन जाता है जो उसे ऊपर की ओर धकेलता है।
स्ट्रोक (Stroke): छिपकली अपने पैरों को पीछे की ओर धकेलती है, जिससे उसे आगे बढ़ने के लिए जरूरी संवेग (Momentum) मिलता है।
रिकवरी (Recovery): इससे पहले कि पानी का बुलबुला फूट जाए और पैर डूबने लगे, छिपकली बिजली की फुर्ती से अपना पैर बाहर खींच लेती है और अगला कदम रख देती है।
पानी पर टिके रहने के लिए केवल तकनीक काफी नहीं है, रफ्तार भी उतनी ही जरूरी है। बेसिलिस्क को करीब 1.5 मीटर प्रति सेकंड की निरंतर गति बनाए रखनी पड़ती है। यदि उसकी रफ्तार कम हुई, तो गुरुत्वाकर्षण बल प्रभावी हो जाएगा और वह पानी में समा जाएगी। इस दौरान संतुलन बनाए रखने के लिए वह अपनी लंबी पूंछ का इस्तेमाल एक ‘पतवार’ (Rudder) की तरह करती है। दौड़ते समय वह अपनी पूंछ को दाएं-बाएं मोड़कर अपना बैलेंस बिगड़ने नहीं देती।
जैसे-जैसे बेसिलिस्क छिपकली बड़ी और भारी होती जाती है, उसके लिए पानी पर दौड़ना मुश्किल होता जाता है। छोटी छिपकलियां काफी लंबी दूरी तक पानी पर दौड़ सकती हैं, जबकि वयस्क छिपकलियां कुछ मीटर बाद तैरने लगती हैं। यह जीव हमें सिखाता है कि प्रकृति ने हर प्राणी को जीवित रहने के लिए कितने विशिष्ट और वैज्ञानिक गुण दिए हैं। बेसिलिस्क की यह दौड़ आज भी वैज्ञानिकों के लिए शोध का एक दिलचस्प विषय है।
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