Bastar Bike Ambulance
Bastar Bike Ambulance: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और सुदूर वनांचलों में रहने वाले आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य सुविधा प्राप्त करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। गंभीर बीमारी या प्रसव के समय मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। हाल ही में लॉन्च की गई ‘बाइक एम्बुलेंस’ सेवा इन दुर्गम इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। यह सेवा न केवल मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचा रही है, बल्कि उन्हें रास्ते में ही प्राथमिक उपचार (First Aid) की सुविधा भी दे रही है।
अक्सर बस्तर और अन्य आदिवासी अंचलों से ऐसी हृदयविदारक तस्वीरें सामने आती थीं, जहाँ सड़क न होने के कारण ग्रामीण मरीज को खाट या कांवड़ पर लादकर मीलों पैदल चलने को मजबूर होते थे। कई बार अस्पताल पहुँचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देते थे। इस विकट समस्या को सुलझाने के लिए जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) फंड का सदुपयोग किया गया। डीएमएफ फंड से संचालित बाइक एम्बुलेंस सेवा ने उन धुंधली और दर्दनाक तस्वीरों को मिटाना शुरू कर दिया है। अब संकरे रास्तों और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर भी यह एम्बुलेंस आसानी से दौड़ रही है।
बस्तर जिले के सिलगेर और सुकमा के जगरगुंडा जैसे अति-संवेदनशील इलाकों में यह सुविधा विशेष रूप से कारगर साबित हो रही है। इन क्षेत्रों में नक्सलियों ने सड़क निर्माण का कड़ा विरोध किया है और जहाँ सड़कें बनी थीं, उन्हें भी काटकर रास्ते अवरुद्ध कर दिए हैं। ऐसी परिस्थितियों में भारी-भरकम संजीवनी एक्सप्रेस (108) या महतारी एक्सप्रेस (102) का पहुँचना असंभव था। बाइक एम्बुलेंस ने इस भौगोलिक बाधा को पार कर लिया है। अब जगरगुंडा अस्पताल तक मरीजों को पहुँचाना काफी सरल और तेज हो गया है।
नक्सल प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों का कहना है कि सड़कें न होने की वजह से वे आधुनिक सुविधाओं से कटे हुए थे। सिलगेर से जगरगुंडा के बीच सेवा देने वाले बाइक एम्बुलेंस चालक मुकेश ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि वे रोजाना चुनौतीपूर्ण रास्तों पर मरीजों को लेकर जाते हैं। मुकेश के अनुसार, नक्सलियों द्वारा सड़कें काट दिए जाने के कारण आपातकालीन स्थिति में ग्रामीणों को कोई साधन नहीं मिलता था, लेकिन अब बाइक एम्बुलेंस इन कटी हुई सड़कों के बीच से रास्ता निकालकर मरीजों तक पहुँच रही है।
भले ही यह देखने में एक मोटरसाइकिल हो, लेकिन इसे विशेष रूप से मेडिकल इमरजेंसी के लिए डिज़ाइन किया गया है। बाइक के साथ एक ‘साइडकार’ जुड़ी होती है, जिसमें मरीज के लेटने के लिए आरामदायक स्ट्रेचर, ऑक्सीजन सिलेंडर और एक छोटा मेडिकल किट होता है। इस सेटअप की वजह से मरीज को ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भी अधिक झटके नहीं लगते। सरकार का उद्देश्य है कि बस्तर के अंदरूनी इलाकों में रहने वाला हर आदिवासी मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ सके और समय पर इलाज न मिलने के कारण किसी की मृत्यु न हो।
छत्तीसगढ़ सरकार की इस पहल की सराहना अब राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। जिस तरह से बाइक एम्बुलेंस ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पहुँच सुनिश्चित की है, उसे देखते हुए आने वाले समय में अन्य दुर्गम ब्लॉकों में भी इस सेवा के विस्तार की योजना है। यह सेवा यह साबित करती है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो संसाधनों का सही इस्तेमाल कर बड़ी से बड़ी बाधा को दूर किया जा सकता है। आज बस्तर के जंगलों में गूँजती बाइक एम्बुलेंस का सायरन आदिवासियों के लिए जीवन का संदेश लेकर आ रहा है।
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