कृषि

Bastar Herbs Ayodhya: अयोध्या में बनेगा रामायणकालीन हर्बल गार्डन, बस्तर से लाए जाएंगे पौधे

Bastar Herbs Ayodhya: छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अपने अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के जंगलों में बेशकीमती औषधीय जड़ी-बूटियां संरक्षित हैं, जो आज भी मानव जीवन के संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही हैं। बस्तर के मूल निवासी, जिन्हें वैद्य कहा जाता है, इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। अब इन औषधियों की खुशबू अयोध्या के सरयू तट पर भी फैलने वाली है, जहां इन्हें लगाने की तैयारी की जा रही है।

Bastar Herbs Ayodhya: रामायण कालीन वन औषधि पार्क

अयोध्या में सरयू नदी के किनारे रामायण कालीन वन औषधि पार्क का निर्माण किया जा रहा है। इस पार्क में बस्तर की जीवन रक्षक औषधियों के पौधे लगाए जाएंगे। बस्तर का दंडकारण्य क्षेत्र प्रभु श्रीराम के वनवास कालखंड से जुड़ा हुआ है और इसी ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए यहां की औषधियों को अयोध्या में स्थान दिया जा रहा है। इसके साथ ही कांकेर से कोन्टा के इन्जरम तक लगभग 200 किलोमीटर लंबे राम पथ गमन मार्ग के दोनों ओर मौल श्री, नीम, चंदन, सीता अशोक, रामफल और सीताफल जैसे पेड़ लगाए जाएंगे। यह पहल राहगीरों को राम वनवास की याद दिलाएगी।

Bastar Herbs Ayodhya: श्रीराम शोध संस्थान की पहल

नई दिल्ली स्थित श्रीराम शोध संस्थान पिछले सत्तर वर्षों से प्रभु श्रीराम के वनवास काल की यात्रा पर शोध कर रहा है। इस संस्थान ने अयोध्या से लेकर रामेश्वर तक की यात्रा के प्रमाणिक स्थलों की खोज की है। शोध के दौरान यात्रा मार्ग में मिलने वाली संस्कृतियों, सभ्यताओं, भाषाओं, रमणीय स्थानों और उस कालखंड की घटनाओं का संकलन किया गया। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर बस्तर को एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है।

दंडकारण्य क्षेत्र का महत्व

रामायण के अनुसार दंडकारण्य क्षेत्र श्रीराम के वनवास का अहम हिस्सा रहा है। इसी क्षेत्र में पाए जाने वाले वन औषधि, कंद और मूल वृक्षों को चिन्हित किया गया है। अब इन्हीं औषधियों के पौधे अयोध्या के औषधि पार्क में लगाए जाएंगे। यह कदम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि औषधीय पौधों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए भी अहम साबित होगा।

औषधियों की सूची

अयोध्या में लगाए जाने वाले पौधों में अमर कंद, हिरण तूतिया, कालमेघ, राम तुलसी, पाताल गरूड़, हनुमान बल, शतावरी, चिरायता, मंडुक पर्ची, वरूण, सीता अशोक, काली निर्गुंडी, काली हल्दी, केउ कंद, नीलकंठ, नौ पत्ता बेल, घोड़ा बच्च, रुद्रवंती, दशा मूल, जंगली हल्दी, पद्म गिलोय, गिलोय, पीपली, भ्रिगंराज और पिपला जड़ी प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन औषधियों का उपयोग प्राचीन काल से ही विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता रहा है।

पौधों की तैयारी

इन पौधों को युद्ध स्तर पर तैयार किया जा रहा है। श्रीराम शोध संस्थान के बस्तर निवासी कार्यकारणी सदस्य विजय भारत जी और अन्य पांच नर्सरी इस कार्य में जुटे हुए हैं। उनका प्रयास है कि इन औषधीय पौधों को सुरक्षित रूप से अयोध्या तक पहुंचाया जाए और वहां इन्हें रोपित कर संरक्षित किया जाए।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

यह पहल न केवल औषधीय पौधों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बस्तर की औषधियां अयोध्या में अपनी पहचान बनाएंगी और श्रद्धालुओं को रामायण काल की याद दिलाएंगी। साथ ही यह प्रयास भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का माध्यम भी बनेगा।

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