Bastar ITBP Strike
Bastar ITBP Strike: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सुरक्षाबलों का अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) ने नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए एक और बड़ा प्रहार किया है। नारायणपुर जिले के सुदूर और दुर्गम इलाके में घुसकर जवानों ने उन स्मारकों को जमींदोज कर दिया है, जिन्हें नक्सली अपनी ताकत और खौफ के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते थे। यह कार्रवाई दर्शाती है कि अब बस्तर के उन कोनों तक भी सुरक्षाबलों की पहुँच मजबूत हो चुकी है, जिन्हें कभी नक्सलियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था।
नारायणपुर जिले के धनोरा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला ग्राम मोहनेर लंबे समय से नक्सली गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ नक्सलियों ने स्थानीय ग्रामीणों के मन में दहशत पैदा करने और अपने संगठन की उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से कई ‘नक्सल स्मारक’ बना रखे थे। आईटीबीपी की 29वीं वाहिनी को इन स्मारकों की सटीक सूचना मिली थी। कमांडेंट दुष्यंत राज जायसवाल के कुशल नेतृत्व में योजना तैयार की गई और कोंडागांव स्थित मुख्यालय से एक विशेष ऑपरेशन टीम को रवाना किया गया।
इस महत्वपूर्ण मिशन की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर (GD) जितेंद्र सिंह को सौंपी गई थी। उनके नेतृत्व में 71 जांबाज जवानों की टीम ने घने जंगलों और चुनौतीपूर्ण रास्तों को पार करते हुए धनोरा थाने से करीब 8 किलोमीटर दूर मोहनेर गांव में दस्तक दी। सुरक्षा के कड़े घेरे और पूरी सतर्कता बरतते हुए जवानों ने नक्सलियों द्वारा स्थापित इन अवैध ढांचों को एक-एक कर ध्वस्त कर दिया। यह ऑपरेशन न केवल सामरिक दृष्टि से सफल रहा, बल्कि इसने क्षेत्र में नक्सलियों के मनोबल को भी भारी चोट पहुंचाई है।
आईटीबीपी की यह कार्रवाई एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है। केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर यह संकल्प लिया है कि 31 मार्च 2026 तक बस्तर संभाग को पूरी तरह से नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षा बल लगातार ‘सर्चिंग’, ‘एरिया डोमिनेशन’ और ‘जनसंपर्क’ जैसे त्रिस्तरीय अभियान चला रहे हैं। मोहनेर में स्मारकों का ध्वस्तीकरण इसी दिशा में बढ़ाया गया एक सशक्त कदम है, जो बताता है कि सरकार अब पीछे हटने वाली नहीं है।
स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि नक्सली स्मारक केवल ईंट-पत्थर के ढांचे नहीं होते, बल्कि वे ग्रामीणों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखने का जरिया होते हैं। जब ये स्मारक ध्वस्त होते हैं, तो ग्रामीणों के मन से वह पुराना भय भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। प्रशासन का उद्देश्य अब केवल बंदूकों की लड़ाई लड़ना नहीं है, बल्कि विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना और ग्रामीणों को लोकतंत्र की मुख्यधारा से जोड़ना है। स्मारकों के टूटने से प्रशासन के प्रति आम जनता का भरोसा और अधिक मजबूत हुआ है।
आईटीबीपी की ‘E’ कंपनी, धनोरा की इस सफलता ने क्षेत्र में शांति बहाली की उम्मीदों को नई उड़ान दी है। सुरक्षा बलों का स्पष्ट संदेश है कि बस्तर में अब केवल संविधान का कानून चलेगा। जहाँ पहले कभी नक्सलियों की समानांतर सरकार और उनके स्मारक हुआ करते थे, अब वहां स्कूल, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं का जाल बिछाया जा रहा है। बस्तर में स्थिरता और विकास का यह नया पड़ाव बताता है कि आने वाले समय में लाल आतंक का साया पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
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