Bastar Naxal Surrender
Bastar Naxal Surrender: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग को नक्सलवाद के दंश से पूरी तरह मुक्त घोषित करने की निर्धारित समय-सीमा (डेडलाइन) समाप्त होने में अब केवल एक सप्ताह शेष है। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर सुरक्षाबलों को एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक सफलता मिली है। बस्तर के अंतिम बड़े कैडर और सबसे सक्रिय लड़ाकू नक्सली नेता, पापाराव ने आधिकारिक तौर पर आत्मसमर्पण कर दिया है। पापाराव अपने साथियों के साथ आधुनिक हथियारों, जिसमें घातक AK-47 राइफल भी शामिल है, को लेकर कुटरू थाने पहुँचा। इस सरेंडर को बस्तर में माओवादी विचारधारा की कमर टूटने के समान देखा जा रहा है।
56 वर्षीय पापाराव उर्फ मंगू मूल रूप से छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का निवासी है। वह नक्सली संगठन में अत्यंत प्रभावशाली पदों पर आसीन था, जिसमें ‘दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी’ (DKSZCM) की सदस्यता प्रमुख है। इसके अलावा, वह पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी के इंचार्ज और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो के सदस्य के रूप में सक्रिय था। अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा AK-47 रखने वाला पापाराव बस्तर के दुर्गम जल-जंगल और जमीन की रग-रग से वाकिफ है। यही कारण था कि वह दशकों तक पुलिस की घेराबंदी और मुठभेड़ों से बचकर निकलने में कामयाब होता रहा, लेकिन अंततः उसने विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय लिया।
पापाराव के आत्मसमर्पण के साथ ही नक्सली संगठन की ‘पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी’ लगभग अस्तित्वहीन हो गई है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘देवा’ के सरेंडर के बाद पापाराव ही इकलौता ऐसा नक्सली बचा था जो न केवल रणनीतिकार था, बल्कि एक सक्रिय फाइटर (लड़ाकू) भी था। संगठन के बाकी बचे हुए शीर्ष कैडर अब काफी उम्रदराज हो चुके हैं और वे युद्ध के मैदान में सक्रिय भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं। पापाराव का जाना बस्तर से माओवाद के अंतिम अध्याय के समापन जैसा है।
बस्तर में शांति बहाली की प्रक्रिया पिछले एक साल से अत्यंत तीव्र रही है। पिछले वर्ष सुरक्षाबलों ने एक के बाद एक कई बड़े ऑपरेशनों को अंजाम दिया, जिसमें माड़वी हिड़मा, संगठन का सचिव बसवाराजू और गणेश उइके जैसे 17 सबसे खूंखार और बड़े कैडर्स का एनकाउंटर किया गया। इसके अतिरिक्त, भूपति, रूपेश और रामधेर जैसे प्रमुख नक्सलियों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ सामूहिक रूप से हथियार डाल दिए थे। इन कड़ियों ने नक्सलवाद के गढ़ को भीतर से खोखला कर दिया था, जिसे अब पापाराव के सरेंडर ने अंतिम रूप दे दिया है।
वर्तमान में नक्सल संगठन की कमान केवल मिशिर बेसरा और गणपति जैसे गिने-चुने बुजुर्ग नेताओं के हाथ में है, जो तकनीकी रूप से संगठन चलाने की कोशिश कर रहे हैं। बटालियन नंबर 1 के कमांडर देवा के हिंसा छोड़ने के बाद पापाराव ही वह अंतिम ‘फाइटिंग फोर्स’ था, जिसके दम पर संगठन बस्तर में टिकने की उम्मीद कर रहा था। अब पापाराव के मुख्यधारा में लौटने के बाद यह निश्चित माना जा रहा है कि बस्तर में नक्सलवाद का सूरज पूरी तरह डूब चुका है और जल्द ही यह क्षेत्र पूरी तरह भयमुक्त और शांतिपूर्ण घोषित किया जाएगा।
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