छत्तीसगढ़

Bastar Naxalism End : कैसे खत्म हुआ बस्तर का लाल आतंक? जानें उन 38 नक्सलियों की सीक्रेट लिस्ट

Bastar Naxalism End : छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पिछले कई दशकों से जारी नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब अपने अंतिम और निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गई है। सुरक्षा बलों के निरंतर ऑपरेशनों, रणनीतिक घेराबंदी और नक्सलियों के बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण ने संगठन की कमर पूरी तरह तोड़ दी है। ताजा सुरक्षा रिपोर्टों के अनुसार, बस्तर में अब शीर्ष स्तर (DKSZDC) का कोई भी बड़ा कमांडर सक्रिय नहीं बचा है। बस्तर और कोंडागांव जिले पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुके हैं, जबकि अन्य जिलों में भी नक्सलियों की संख्या अब दहाई के अंकों में सिमट गई है। यह सुरक्षा बलों की एक बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है।

ध्वस्त हुआ नक्सलियों का शीर्ष ढांचा: कैंप हटाकर खुलेंगे सुविधा केंद्र

नक्सली संगठन का नेतृत्व पूरी तरह बिखर चुका है। शीर्ष कमांडर या तो मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं या उन्होंने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है। संगठन के इस पतन का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अब उन इलाकों से पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कैंप हटाए जा रहे हैं, जो कभी नक्सलियों के गढ़ हुआ करते थे। दंतेवाड़ा के कटेकल्याण इलाके का जारम कैंप इसका ताजा उदाहरण है, जिसे अब बंद कर दिया गया है। प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया है कि इन कैंपों के स्थान पर अब आदिवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सरकारी सुविधाओं के केंद्र खोले जाएंगे, ताकि विकास की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक हो सके।

96% इलाका नक्सल मुक्त: 1000 गांवों में एक साल से कोई हलचल नहीं

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बस्तर संभाग का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा अब नक्सल प्रभाव से पूरी तरह बाहर है। संभाग के कुल 1100 गांवों में से करीब 1000 गांव ऐसे हैं, जहां पिछले एक साल के दौरान एक भी नक्सली गतिविधि दर्ज नहीं की गई है। सुकमा और बीजापुर के कुछ सीमावर्ती इलाकों में केवल छिटपुट आवाजाही की खबरें हैं। सरकार 31 मार्च की समयसीमा (डेडलाइन) समाप्त होने के बाद इन गांवों को आधिकारिक तौर पर ‘नक्सल मुक्त’ घोषित करने की तैयारी कर रही है। विशेष प्रोत्साहन के रूप में, नक्सल मुक्त घोषित होने वाले प्रत्येक गांव को विकास कार्यों के लिए एक करोड़ रुपये की विशेष अनुदान राशि दी जाएगी।

सरेंडर की लहर: 2600 नक्सलियों ने बंदूक छोड़ थामी विकास की राह

नक्सलियों की तथाकथित ‘जनताना सरकार’ अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। समानांतर सत्ता चलाने का दावा करने वाले संगठन का आधार अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। जनवरी 2024 से अब तक 2,600 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिनमें बड़े कैडर के लड़ाके भी शामिल हैं। ग्रामीणों का भरोसा अब नक्सलियों के बजाय सड़क, बिजली और शिक्षा जैसे प्रशासनिक कार्यों पर बढ़ा है। सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि पूरे संभाग में अब केवल 38 सक्रिय नक्सली बचे हैं, जो भारी दबाव में हैं और जल्द ही आत्मसमर्पण कर सकते हैं।

जिलों के अनुसार नक्सलियों की संख्या: दंतेवाड़ा में बचा केवल एक

वर्तमान में नक्सलियों की स्थिति बेहद कमजोर है। जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो:

  • कांकेर: 19 (सर्वाधिक)

  • बीजापुर: 11

  • सुकमा: 05

  • नारायणपुर: 02

  • दंतेवाड़ा: 01 (ACM कैडर का अंतिम नक्सली)

  • बस्तर और कोंडागांव: 00 (पूर्णतः मुक्त)

दंतेवाड़ा का अंतिम बचा हुआ नक्सली भी सुकमा की ओर पलायन कर गया है, जिससे दंतेवाड़ा में अब एक भी संवेदनशील या अतिसंवेदनशील गांव नहीं बचा है। बस्तर का यह बदलाव क्षेत्र में शांति और समृद्धि के एक नए युग की शुरुआत का संकेत है।

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