FIFA World Cup History : फीफा विश्व कप को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय खेल आयोजन माना जाता है। इस टूर्नामेंट ने फुटबॉल प्रेमियों को कई यादगार गोल, शानदार मुकाबले और खेल भावना के अनगिनत उदाहरण दिए हैं। हालांकि, इसके इतिहास में कुछ ऐसे पल भी दर्ज हैं जिन्हें खेल जगत कभी भूल नहीं सकता। जर्मनी में आयोजित 2006 फीफा विश्व कप ऐसा ही एक टूर्नामेंट था, जिसे मैदान पर बढ़ती आक्रामकता और अनुशासनहीनता के कारण फुटबॉल इतिहास के सबसे विवादास्पद विश्व कपों में गिना जाता है।

कार्डों की रिकॉर्ड बारिश ने बढ़ाई टूर्नामेंट की बदनामी
2006 विश्व कप में रेफरियों ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान कुल 345 येलो कार्ड और 28 रेड कार्ड दिखाए थे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि कई मुकाबलों में खिलाड़ियों के बीच तनाव और टकराव सामान्य सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका था। हालांकि, इन सभी मैचों में सबसे अधिक चर्चा पुर्तगाल और नीदरलैंड्स के बीच खेले गए राउंड ऑफ 16 मुकाबले की हुई, जिसे बाद में “द बैटल ऑफ नूर्नबर्ग” के नाम से जाना गया।

रोनाल्डो की चोट ने बदल दिया मैच का माहौल
25 जून 2006 को जर्मनी के नूर्नबर्ग स्टेडियम में खेले गए इस मुकाबले को देखने के लिए लगभग 41 हजार दर्शक मौजूद थे। मैच की शुरुआत से ही दोनों टीमों के खिलाड़ी बेहद आक्रामक दिखाई दिए। खेल के शुरुआती मिनटों में ही कई कड़े टैकल देखने को मिले।
मैच के 33वें मिनट में पुर्तगाल के युवा स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो को नीदरलैंड्स के डिफेंडर खालिद बोल्हाहौज़ के खतरनाक टैकल का सामना करना पड़ा। इस टैकल में रोनाल्डो बुरी तरह चोटिल हो गए। दर्द के बावजूद उन्होंने कुछ समय तक खेल जारी रखा, लेकिन आखिरकार उन्हें आंसुओं के साथ मैदान छोड़ना पड़ा। बाद में रोनाल्डो ने कहा कि विरोधी खिलाड़ी का उद्देश्य गेंद हासिल करना नहीं बल्कि उन्हें चोट पहुंचाना था।
दूसरे मिनट से ही शुरू हो गया था कार्ड दिखाने का सिलसिला
रूसी रेफरी वैलेन्टिन इवानोव को मुकाबले के दूसरे ही मिनट में पहला येलो कार्ड दिखाना पड़ा। सातवें मिनट तक दूसरा कार्ड भी निकल चुका था। इसके बाद लगातार फाउल, बहस और झड़पों का सिलसिला चलता रहा।
खिलाड़ियों के बीच बढ़ते तनाव के कारण रेफरी को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा। मैच के दौरान कई बार ऐसी स्थिति बनी जब खेल से ज्यादा खिलाड़ियों के बीच विवाद चर्चा का विषय बन गया। दर्शकों और विशेषज्ञों को लगने लगा कि मुकाबला नियंत्रण से बाहर जा रहा है।
चार खिलाड़ियों को दिखा बाहर का रास्ता
इस मुकाबले की सबसे अनोखी बात यह रही कि किसी भी खिलाड़ी को सीधे रेड कार्ड नहीं दिखाया गया। मैदान से बाहर भेजे गए सभी खिलाड़ियों को दूसरा येलो कार्ड मिलने के बाद रेड कार्ड मिला।
पुर्तगाल के कॉस्टिन्हा पहले खिलाड़ी बने जिन्हें हैंडबॉल के कारण दूसरा येलो कार्ड मिला। इसके बाद खालिद बोल्हाहौज़ को फिगो को कोहनी मारने के लिए दूसरा येलो कार्ड दिखाया गया। मैच के अंतिम चरण में पुर्तगाल के डेको और नीदरलैंड्स के जियोवानी वैन ब्रोंखोर्स्ट भी बाहर भेज दिए गए। परिणामस्वरूप दोनों टीमें 9-9 खिलाड़ियों के साथ मुकाबला समाप्त करने को मजबूर हुईं।
विश्व रिकॉर्ड बना 16 येलो और 4 रेड कार्ड
यह मुकाबला कार्डों की संख्या के कारण विश्व कप इतिहास में दर्ज हो गया। पूरे मैच में कुल 16 येलो कार्ड और 4 रेड कार्ड दिखाए गए, जो उस समय विश्व कप का रिकॉर्ड था। मैदान पर लगातार हो रही झड़पों ने इस मुकाबले को फुटबॉल से ज्यादा संघर्ष का प्रतीक बना दिया।
पुर्तगाल की जीत भी विवादों में दब गई
मनीश द्वारा 23वें मिनट में किए गए एकमात्र गोल की बदौलत पुर्तगाल ने मुकाबला 1-0 से जीत लिया और क्वार्टर फाइनल में जगह बना ली। लेकिन इस जीत की चर्चा कम और मैच में हुई हिंसा की चर्चा ज्यादा हुई।
तत्कालीन फीफा अध्यक्ष Sepp Blatter ने भी रेफरी वैलेन्टिन इवानोव के प्रदर्शन पर सवाल उठाए थे। उन्होंने यहां तक कहा था कि रेफरी को खुद को भी एक येलो कार्ड दिखाना चाहिए। हालांकि बाद में उन्हें अपने बयान के लिए माफी मांगनी पड़ी। इसके बावजूद फीफा ने इवानोव को टूर्नामेंट के शेष मुकाबलों में रेफरी की जिम्मेदारी नहीं दी।
आज भी कायम है ‘बैटल ऑफ नूर्नबर्ग’ की चर्चा
करीब दो दशक बाद भी यह मुकाबला फुटबॉल इतिहास के सबसे बदनाम मैचों में गिना जाता है। लोगों को इस खेल का परिणाम नहीं, बल्कि मैदान पर हुई धक्का-मुक्की, फाउल, विवाद और कार्डों की बारिश याद है। यही कारण है कि “बैटल ऑफ नूर्नबर्ग” आज भी विश्व कप इतिहास के सबसे काले अध्यायों में शामिल माना जाता है।










