Bengal Politics
Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर के एक फैसले ने बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। संत कबीर का दोहा “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय…” आज हुमायूं कबीर के राजनीतिक सफर पर नया मोड़ ले रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) से निष्कासित होने के बाद, हुमायूं कबीर अब अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे हैं। उनके द्वारा ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर छेड़ी गई बहस ने बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हुमायूं का यह कदम ममता बनर्जी की आगामी चुनावी जीत की रणनीति को कितना प्रभावित करेगा।
तृणमूल कांग्रेस से बाहर किए जाने के बाद, हुमायूं कबीर ने एक बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा है कि वह दिसंबर 2025 में अपना नया राजनीतिक दल बनाएंगे और 2026 के विधानसभा चुनाव में 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे।
यह घोषणा तब आई है जब वह पिछले एक महीने से मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ बनाने की कवायद कर रहे थे। गौरतलब है कि टीएमसी सरकार में रहते हुए भी उन्हें मस्जिद के लिए जमीन नहीं मिल सकी। हुमायूं बार-बार कहते रहे कि 6 दिसंबर को वह मस्जिद की स्थापना करेंगे, लेकिन प्रशासन ने अनुमति नहीं दी। पार्टी की चुप्पी के बाद 4 दिसंबर को तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें निष्कासित कर दिया। हुमायूं का यह कदम सीधा ममता बनर्जी के वोट बैंक को काटने की तैयारी माना जा रहा है।
इस पूरे विवाद की जड़ हुमायूं कबीर का यह बयान है कि बनने वाली मस्जिद का नाम ‘बाबरी’ होगा। यह नाम बंगाल की राजनीति में विवाद का केंद्र बन गया है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस हमेशा से तुष्टीकरण के आरोपों से घिरी रही है।
पार्टी अच्छी तरह जानती है कि उसकी जीत केवल मुस्लिम वोटों पर निर्भर नहीं है, बल्कि लाखों हिंदू वोटरों का समर्थन भी निर्णायक है, जिनकी आस्था राम मंदिर, काली और दुर्गा पूजा से जुड़ी है। ऐसे संवेदनशील समय में ‘बाबरी’ नाम का इस्तेमाल सीधे तौर पर हिंदू वोटरों को नाराज कर सकता है, जिससे टीएमसी को बड़ा नुकसान होने की आशंका है।
मुर्शिदाबाद पश्चिम बंगाल के उन महत्वपूर्ण जिलों में से है जहाँ मुस्लिम आबादी 70% से अधिक है। यहाँ का मुस्लिम वोट बैंक ही तय करता है कि कौन विधायक बनेगा। हुमायूं कबीर खुद को मुस्लिमों के कट्टर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जिसका सीधा असर टीएमसी के वोट शेयर पर पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, कई मुस्लिम संगठन बाबरी मस्जिद मुद्दे पर हुमायूं कबीर का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और उन्हें आर्थिक मदद भी मिल रही है। हालांकि, जमीन प्रशासन की अनुमति के बिना नहीं मिल सकती, लेकिन यह मुद्दा स्थानीय स्तर पर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण में अहम भूमिका निभा सकता है।
हुमायूं कबीर का राजनीतिक इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है:
2011: कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की और बाद में तृणमूल में शामिल होकर मंत्री बने।
2019: तृणमूल छोड़कर बीजेपी में गए, लेकिन लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
2021: फिर तृणमूल में वापसी की और भरतपुर से विधायक बने।
उनकी पहचान हमेशा से विवादित बयानों से जुड़ी रही है, चाहे वह हिंदुओं को 30% कहकर नदी में बहाने की बात हो या अब बाबरी मस्जिद का मुद्दा।
ममता बनर्जी की जीत में मुस्लिम वोटरों की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन हुमायूं कबीर का नया दल और बाबरी मस्जिद का मुद्दा मुस्लिम वोटों को बाँट सकता है। यह नया समीकरण टीएमसी के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है, खासकर मुर्शिदाबाद और आसपास के उन जिलों में जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है। यह देखना बाकी है कि हुमायूं का यह दांव बंगाल की सियासत में उन्हें बड़ा खिलाड़ी बनाता है या यह महज एक चुनावी शोर साबित होगा।
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