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Bihar voter list controversy : बिहार वोटर लिस्ट विवाद,सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा -65 लाख हटाए गए मतदाताओं का डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

Bihar voter list controversy : बिहार की वोटर लिस्ट संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग (ECI) से सख्त सवाल पूछते हुए जानना चाहा कि वोटर लिस्ट से हटाए गए 65 लाख लोगों का डेटा अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाना गंभीर मामला है और आम नागरिकों को इसका पता चलना चाहिए। चुनाव आयोग ने जवाब में कहा कि अगर कोर्ट आदेश देता है, तो हटाए गए वोटर्स की सूची सार्वजनिक कर दी जाएगी। साथ ही आयोग ने मृतकों की पहचान और सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया का बचाव भी किया।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने EC से कहा कि आपके अनुसार 1 जनवरी 2025 तक बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर हैं, जिनमें से 7.24 करोड़ के फॉर्म पहले ही भरे जा चुके हैं, जबकि 65 लाख लोग ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिए गए हैं। इनमें से 22 लाख के बारे में कहा गया कि वे मृत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि ऐसी क्या व्यवस्था है जिससे उनके परिवार को पता चले कि वे सूची से बाहर हैं या मृत घोषित कर दिए गए हैं?

जस्टिस कांत ने स्पष्ट किया, “नागरिकों के अधिकार संविधान और कानून से जुड़े हैं। क्या चुनाव आयोग ऐसा तंत्र नहीं बना सकता जिससे लोगों को वोटर लिस्ट की जानकारी स्थानीय नेताओं के जरिए न लेनी पड़े?”

चुनाव आयोग ने दी सफाई

चुनाव आयोग के वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कोर्ट में कहा,”हमने बूथों की संख्या बढ़ाई है, बीएलओ (Booth Level Officer) की जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है और मृतकों की पहचान के लिए घर-घर जाकर सत्यापन किया जा रहा है।” जब कोर्ट ने पूछा कि इसे इंटरनेट पर क्यों नहीं किया गया, तो आयोग ने कहा कि “हटाए गए लोगों की सूची वेबसाइट पर उपलब्ध है, जहां EPIC नंबर डालकर स्थिति जानी जा सकती है।”

2003 की लिस्ट क्यों बनी आधार?

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि 2003 की वोटर लिस्ट को कटऑफ मानने का आधार क्या है? याचिकाकर्ता के वकील निज़ाम पाशा ने दलील दी कि अगर 1 जनवरी 2003 की सूची को ही आधार मान लिया जाए, तो बड़ी संख्या में नए और योग्य मतदाता छूट सकते हैं। ECI के वकील द्विवेदी ने जवाब में कहा कि,”मैं यह नहीं कहता कि चुनाव आयोग सर्वशक्तिमान है। लेकिन अनुच्छेद 324, धारा 15, 21(2), 21(3) हमें SIR करने का अधिकार देते हैं। सवाल यह है कि क्या हमने प्रक्रिया को नियमों के अनुसार अंजाम दिया है या नहीं।”

क्या SIR संवैधानिक है?

सुनवाई के दौरान, चुनाव आयोग ने बताया कि संसद को अनुच्छेद 327 के तहत चुनाव संबंधी कानून बनाने का अधिकार है। ECI के पास विशेष अधिकार हैं, लेकिन वे मनमानी के दायरे में नहीं आते। SIR प्रक्रिया नियमों और कानूनों के अंतर्गत चल रही है। साथ ही द्विवेदी ने कहा कि “हमने कोई बहिष्करण नहीं किया है। प्रक्रिया समावेशी है। बिहार में साक्षरता दर बढ़ी है, लोग अब अधिक जागरूक हैं। 7.24 करोड़ लोग फॉर्म भर चुके हैं, केवल 65 लाख नाम हटे हैं और इनमें से भी 22 लाख मृत पाए गए हैं।”

विपक्ष ने जताई गंभीर आपत्ति

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 1 अगस्त 2025 को जारी की गई थी और अंतिम सूची 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित की जाएगी। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया लाखों योग्य मतदाताओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित कर देगी। इस मुद्दे पर विपक्ष लगातार सरकार और चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठा रहा है।

पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखना अनिवार्य है, ताकि आम नागरिक अपने मतदाता अधिकारों से वंचित न हो जाएं। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि हटाए गए वोटर्स का डेटा सार्वजनिक किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि मृतकों की पहचान सही तरीके से हो।

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